May 16, 2026पहाड़ के गांवों के बंद दरवाजों में कैद हैं अधूरी हंसी और सपने पलायन ने पहाड़ से सिर्फ लोग नहीं, उसकी आत्मा भी छीन ली रोजगार व बेहतर जिंदगी की तलाश में गांव हो गए हैं आज बूढ़े खेत बंजर,पगडंडियां सुनसान व बुजुर्ग ताक रही अपनों की राह देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत होती है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है तो लगता है जैसे प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। हवा में आज भी बुरांश की खुशबू है और पगडंडियों में घास उगी है और आज भी वैसी ही हैं, लेकिन अब उनमें जीवन की आवाज नहीं बची।कभी जिन गांवों में हर शाम चूल्हों का धुआं उठता था, जहां तिबारियों में बैठकर बुजुर्ग लोकगीत गाते थे, जहां बच्चे खेतों में दौड़ते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा है। घरों के दरवाजों पर जंग लगे ताले लटक रहे हैं। कई मकानों की छतें टूट चुकी हैं। दीवारों पर उग आई काई मानो वक्त के बीतने का हिसाब दे रही हो। पलायन ने पहाड़ को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों के युवा शहरों की तरफ चले गए। पीछे रह गए बूढ़े मां-बाप, सूने आंगन और इंतजार करती आंखें।उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी इन गांवों में जीवन धड़कता था। सुबह महिलाएं घास और लकड़ी लेने जंगल जाती थीं, पुरुष खेतों में हल चलाते थे, बच्चे स्कूल की पगडंडियों पर दौड़ते थे। शाम होते ही चौपाल सजती थी और तिबारियों में लोकगीत गूंजते थे। अब वही गांव वीरान खड़े हैं। खेतों में झाड़ियां उग आई हैं और पगडंडियों पर अब केवल जंगली जानवरों के निशान दिखते हैं।रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में पहाड़ का युवा शहरों की ओर चला गया। देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी और चंडीगढ़ जैसे शहरों ने गांवों की रौनक अपने भीतर समेट ली। पीछे रह गए सिर्फ बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखें हर त्योहार पर दरवाजे की ओर टिक जाती हैं। वह आज भी उम्मीद करते हैं कि शायद इस बार बेटा लौट आएगा। शायद इस बार घर में फिर चूल्हा जलेगा। शायद सूनी पड़ी तिबारी में फिर हंसी सुनाई देगी।पहाड़ के कई गांव अब भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। वहां घर तो हैं, लेकिन उनमें जिंदगी नहीं है। टूटी छतों से बरसात टपकती है, दीवारों का पलस्तर झड़ चुका है और बंद कमरों में मकड़ियों ने अपने जाले बुन लिए हैं। ऐसा लगता है मानो घर भी अपने लोगों के लौटने की राह देखते-देखते थक गए हों। विडंबना यह है कि जिस पहाड़ ने देश को सैनिक, शिक्षक, वैज्ञानिक और अधिकारी दिए, वही पहाड़ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। गांव खाली हो रहे हैं संस्कृति सिमट रही है और लोक परंपराएं धीरे-धीरे यादों में बदलती जा रही हैं।
May 16, 2026आक्रोशित ग्रामीण बैठे धरने पर, शव नहीं उठाने दियापौड़ी। गुलदार के हमले में बीती शाम एक बुजुर्ग की मौके पर ही मौत हो गयी। सूचना मिलने पर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और वन विभाग को घटना की सूचना दी। वहीं बीती शाम से स्थानीय ग्रामीण मौके पर मौजूद है साथ ही आक्रोशित ग्रामीणों द्वारा शव को वन विभाग के हवाले नहीं किया गया है।जानकारी के अनुसार बीती शाम जिला मुख्यालय के करीब बसे कमंद गांव में गुलदार ने एक बुजुर्ग को निवाला बना लिया। जिससे क्षेत्र में दशहत का माहौल है। गांव के पास खेत में बकरियों के लिए चारा पत्ती लेने गए बुजुर्ग पर गुलदार ने शाम करीब 7 बजे हमला किया और घसीटते हुए दूर ले गया। देर रात छानबीन के बाद बुजुर्ग का शव बरामद किया गया। इस घटना के खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश है। बताया जा रहा है कि बीती शाम मोहन चंद्रम मलासी घर के पास बकरियों के लिए चारापत्ती लेने गए थे। इसी दौरान करीब 7 बजे गुलदार ने उन पर हमला कर दिया और घसीटते हुए दूर ले गया। बुजुर्ग जब काफी देर तक घर नहीं पहुंचा तो स्वजनों व ग्रामीणों ने खोजबीन शुरू की। देर रात तक छानबीन करने पर शव क्षत विक्षत पाया गया। सूचना के बाद क्षेत्र के ग्रामीण एकजुट हो गए हैं। प्रशासन व वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। आज भी स्थानीय लोगों ने शव को नहीं उठाने दिया और वनविभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। लोगों का कहना है कि विभाग लीसा निकलवाने और नाच गाने में व्यस्त है और लोग जानवरों का शिकार बन रहे हैं। ग्राम प्रधान थली साधना देवी ने बताया कि गांव में लगातार गुलदार की धमक देखने को मिलती है।बता दें कि उत्तराखण्ड राज्य में वन्य जीव व मानव संघर्ष थमने का नाम नही ले रहा है। पिछले कई माह से पौड़ी जनपद के कई क्षेत्रों में गुलदार का आंतक जारी है। हालांकि वन विभाग द्वारा वन्य जीवों के आंतक के खात्मे को लेकर उनके प्रभावित क्षेत्रों में शिकारी तैनात कर दिये गये है लेकिन उन शिकारियों द्वारा भी कई गुलदारों को मौत के घाट उतार देने के बावजूद भी यह आंतक समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। इस कारण स्थानीय लोगों में वन विभाग के खिलाफ आक्रोश व्याप्त हो चुका है। जिसका ताजा प्रमाण आज कमंद गांव में सामने आया है जहंा बीती रात से गुलदार का शिकार हुए व्यक्ति का शव मौके पर पड़ा है लेकिन आक्रोशित ग्रामीणों द्वारा प्रशासन को वह शव उठाने नहीं दिया जा रहा है।
May 16, 2026मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा प्रधान और बुजुर्ग के पैर छूने वाली तस्वीर पर छिड़ी बहस सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है तस्वीरयुवा महिला प्रधान पर उठे सवाल, समर्थक आए सामने लोकतंत्र, संस्कार व सत्ता के बदलते स्वरूप पर बहस देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मातृशक्ति और युवा नेतृत्व को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार सामाजिक मर्यादाओं और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर कर देती है। हाल ही में पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पहाड़ के राजनीतिक गलियारों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।बता दें कि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत इन दिनों अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई है। वजह बनी एक वायरल तस्वीर, जिसमें ग्राम पंचायत की युवा महिला प्रधान वीरा रावत कुर्सी पर बैठी नजर आ रही हैं, जबकि उनके सामने दादा की उम्र का एक बुजुर्ग व्यक्ति झुककर उनके पैर छूता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा और पढ़ी-लिखी प्रधान वीरा रावत के पास गाँव के ही एक बुजुर्ग व्यक्ति किसी सरकारी काम या दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराने पहुंचे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आई जानकारी के अनुसार इस दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जहां बुजुर्ग व्यक्ति ने युवा महिला प्रधान के पैर छुए। इस घटना की तस्वीर और जानकारी जैसे ही सामने आई, यह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।पहाड़ में जहां गाँव की बेटियों को पूजने और बड़ों से आशीर्वाद लेने की अटूट परंपरा है, वहां एक दादा की उम्र के बुजुर्ग द्वारा युवा प्रधान के पैर छूने की घटना ने लोगों को दो पक्षों में बांट दिया है। हालांकि इस मामले में कुछ लोग महिला प्रधान वीरा रावत के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि तस्वीर को एकतरफा तरीके से देखा जा रहा है। संभव है कि बुजुर्ग व्यक्ति ने स्वेच्छा से प्रधान पद का सम्मान करने के लिए ऐसा किया हो। समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में चुने गए जनप्रतिनिधि का सम्मान करना गलत नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन सवाल केवल सम्मान का नहीं, बल्कि उस सामाजिक संदेश का भी है जो ऐसी तस्वीरें समाज में छोड़ती हैं। पंचायत व्यवस्था को गांवों की सबसे संवेदनशील लोकतांत्रिक इकाई माना जाता है, जहां प्रधान को जनसेवक की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में जब सत्ता और पद को लेकर दिखावे की तस्वीरें सामने आती हैं, तो लोगों के मन में असहजता पैदा होना स्वाभाविक माना जा रहा है।यह विवाद महिला नेतृत्व को लेकर भी नई चर्चा खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे महिला प्रधान को अनावश्यक रूप से निशाना बनाने की कोशिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही तस्वीर किसी पुरुष प्रधान की होती, तो शायद इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे विनम्रता और सामाजिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र के बु(िजीवियों, ग्रामीणों और सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह सम्मान वीरा रावत नामक एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि ग्राम प्रधान के संवैधानिक पद को दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद पर बैठता है, तो वह व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। कई बार ग्रामीण अपनी अत्यधिक कृकृतज्ञता, काम हो जाने की खुशी या प्रशासनिक औपचारिकता के तहत पद के प्रति अपना सम्मान इस तरह प्रकट करते हैं। लोकतंत्र में पद की एक अपनी गरिमा होती है जो उम्र और जेंडर से ऊपर होती है।दूसरा पक्ष इस घटना को उत्तराखंड की समृ( सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ देख रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में कुमाऊंनी और गढ़वाली संस्कृति के तहत बेटियां और बहुएं हमेशा पूजनीय रही हैं। गाँव के बुजुर्ग हमेशा युवाओं को आशीष देते हैं। आलोचकों का कहना है कि भले ही कोई व्यक्ति कितने ही बड़े पद पर क्यों न बैठ जाए, लेकिन सामाजिक जीवन में उसे अपनी उम्र, मर्यादा और पहाड़ के पारंपरिक संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बुजुर्ग भावुकतावश पैर छूने भी लगे, तो युवा प्रधान को शालीनता से उन्हें रोकना चाहिए था।पहाड़ में युवा महिला नेतृत्व का उभरना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है और वीरा रावत जैसी युवा प्रधानों से क्षेत्र को विकास की बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन इस तरह के मामलों से यह भी सीख मिलती है कि ग्रामीण भारत में सफल नेतृत्व वही माना जाता है, जो प्रशासनिक शक्ति के साथ-साथ लोक-परंपराओं और बुजुर्गों के सम्मान के बीच एक सही संतुलन बनाकर चले। यह मामला इस बात पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते समय अपनी उन बुनियादी जड़ों और संस्कारों को न भूलें, जो हमारे पहाड़ की असली पहचान हैं।
May 16, 2026प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश पर आए आर्थिक संकट का जिक्र करने के बाद देश की जनता से अपने तमाम खर्चों में कटौती करने की अपील से यह साफ हो गया था कि आने वाला समय में महंगाई का बम फूटना तय है। अब इसकी शुरुआत हो चुकी है। सोने पर टैक्स बढ़ाने से लेकर दूध, पेट्रोल, डीजल व सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी हो चुकी है। इस वक्त महंगाई की दर बीते 42 महीनो के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में हो चुकी अकल्पनीय वृद्धि से पहले ही आम लोगों का जीवन तबाह था लेकिन अब खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुए एनर्जी संकट ने इसमें आग में घी डालने जैसा काम किया है। वर्तमान के जो हालात हैं वह डरावने इसलिए भी है क्योंकि सरकार के पास अब इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। हमेशा चुनावी मोड में रहने वाली केंद्र की मोदी सरकार द्वारा सर पर मंडराने वाले इस सबसे बड़े संकट को लंबे समय तक नजर अंदाज किए जाने से इसके दुष्परिणाम और भी अधिक घातक रूप ले चुके हैं। अभी सरकार सिर्फ लोगों से यह न खरीदो वह न खरीदो तथा इसका आयात निर्यात करने न करने में उलझी हुई है वह यह उम्मीद लगाए बैठी है कि देश की जनता सब झेल लेगी और आने वाले समय में स्थितियां सामान्य हो जाएगी लेकिन इसकी संभावना दो—चार प्रतिशत ही है। वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का जो सिलसिला अभी शुरू हुआ है वह अब थमने वाला नहीं है। आने वाले समय में अगर आम लोगों को उनकी जरूरत का समान नहीं मिलेगा या फिर इतनी कीमत पर तो मिलेगा ही कि वह आम आदमी की क्रय क्षमता से बाहर हो जाएगा तब देश में आंतरिक असुरक्षा के कारण अराजकता की भी स्थिति पैदा होने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है। देश में कुछ हिस्सों से इस मूल्य वृद्धि के खिलाफ लोगों के सड़कों पर आने की खबरें आनी शुरू हो चुकी हैं। कीमत बढ़ने के साथ—साथ विरोध प्रदर्शन के इन स्वरों को तेज होने से भी कोई नहीं रोक पाएगा? लोगों की यह नाराजगी बेवजह नहीं है जिस सरकार ने अच्छे दिन लाने का भरोसा देकर सत्ता हासिल की हो वह अगर लोगों को अब अपनी आम और जरूरी जरूरतो को भी पूरा करने में स्वयं को लाचार महसूस कर रहे हैं तो यह सरकार की सबसे बड़ी् विफलता ही है। क्या सत्ता में बैठे लोगों को यह पता नहीं था कि देश पर इतना बड़ा संकट आने वाला है और अगर पता था तो सरकार ने समय रहते उसके उचित निदान के लिए कोई तैयारी क्यों नहीं की? पीएम क्यों देश के लोगों को विकसित भारत और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का इनपुट तो परोसते रहे? आज जब पेट्रोल डीजल और रसोई गैस का संकट सामने खड़ा है तो वह तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे का हवाला देते हुए उसकी कीमते बढ़ा रहे हैं अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब तेल की कीमतें कम थी तो मुनाफा कौन कमा रहा था तब जनता को सस्ता पेट्रोल डीजल क्यों नहीं मोहिया कराया गया? हर जगह अब सवाल ही सवाल है। मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली थी तब डालर के मुकाबले रुपया 64 के आसपास था जो अब 95 तक पहुंच चुका है सवाल यह है कि इस बीच कभी सरकार की नींद क्यों नहीं टूटी? मोदी कहते हैं हमारा क्या है जी हम तो झोला उठाएंगे और चल देंगे। मोदी का क्या है और जनता का क्या है जी? इस फर्क को भी उन्हें समझना होगा क्योंकि वह देश के प्रधानमंत्री है और उन्हें प्रधानमंत्री देश की जनता ने बनाया है तब क्या जनता उन्हें ऐसे ही झोला उठाकर जाने देगी? विचारणीय सवाल है?
May 16, 2026देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से ओबीसी वेलफेयर पार्लियामेंट्री कमेटी के प्रतिनिधिमण्डल ने मुख्यमंत्री आवास में भेंट की।आज यहां मुख्यमंत्री ने कहा कि ओ.बी.सी संसदीय समिति सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ओ.बी.सी वेलफेयर के लिए राज्य में विधिक और संस्थागत व्यवस्था है। विभिन्न योजनाओं के पॉलिसी रिव्यू, फीडबैक और फॉलोअप के माध्यम के योजनाओं का लाभ प्रत्येक ओबीसी परिवार को पहुंचाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में लगभग 90 जाति / उपजाति समुदाय ओबीसी की सूची में हैं। जिनके विकास के लिए राज्य सरकार, प्रतिबद्धता से कार्य कर रही है। राज्य की नीति और बजट को गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों के कल्याण को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन जैसी योजनाओं को जरूरतमंदों तक प्रभावी रूप से पहुंच रही है। इस दौरान ओबीसी वेलफेयर पार्लियामेंट्री कमेटी की ओर से अध्यक्ष सांसद गणेश सिंह एवं अन्य सांसद विजय बघेल, डॉ. स्वामी सच्चिदानंद हरि साक्षी (साक्षी महाराज), विघुत बरन महतो, रोडमल नागर, श्री रमाशंकर विधार्थी राजभर, डॉ अशोक कुमार यादव, गिरधारी यादव, मस्तान राव यादव बीड़ा, राजेंद्र गहलोत, शुभाशीष खूंटिया, मयंककुमार नायक एवं डॉ. भीम सिंह मौजूद रहे।
May 16, 202671 हजार का ऋण माफ, 50 हजार की आर्थिक सहायता देहरादून। जिला प्रशासन ने कैंसर पीडित परिवार को राहत देते हुए 71 हजार का ऋण माफ कर 50 हजार की आर्थिक सहायता भी प्रदान की।आज यहां मुख्यमंत्री के निर्देशों को धरातल पर उतारते हुए जिला प्रशासन देहरादून लगातार मानवीय संवेदनशीलता एवं त्वरित कार्रवाई के साथ जरूरतमंद परिवारों को राहत पहुंचाने का कार्य कर रहा है। जिलाधिकारी सविन बंसल के नेतृत्व में जिला प्रशासन द्वारा विभिन्न जिला स्तरीय प्रोजेक्ट, सीएसआर फंड, रायफल क्लब मद तथा अन्य उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से अनेक असहाय एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश हैं कि जनमानस की समस्याओं के समाधान में किसी भी स्तर पर संवेदनहीनता अथवा योजनाओं के लाभ से वंचित होने जैसी स्थिति नहीं आनी चाहिए। यदि किसी जरूरतमंद, असहाय अथवा पात्र व्यक्ति तक शासन की योजनाओं का लाभ पहुंचने में किसी प्रकार का गैप रह जाता है, तो जिला प्रशासन अपने स्तर पर उस कमी को पूरा करते हुए तत्काल सहायता उपलब्ध कराए। जनसामान्य की समस्याओं के त्वरित एवं संवेदनशील समाधान हेतु प्रतिबद्ध जिला प्रशासन ने एक बार फिर मानवीय संवेदनशीलता का परिचय देते हुए आर्थिक संकट से जूझ रहे एक कैंसर पीड़ित परिवार को बड़ी राहत प्रदान की है। इसी क्रम में हाल ही में रायपुर क्षेत्र की एक महिला, जिनके पति कैंसर से पीड़ित हैं और परिवार गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, को जिला प्रशासन द्वारा बड़ी राहत प्रदान की गई। परिवार पर लगभग 71 हजार रुपये का ऋण बकाया था तथा लगातार इलाज एवं घरेलू खर्चों के कारण परिवार दयनीय स्थिति में पहुंच चुका था। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने सीएसआर फंड से ऋण की सम्पूर्ण धनराशि जमा कराते हुए संबंधित परिवार को ऋणमुक्त कराया। साथ ही अतिरिक्त आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई गई। रायपुर विकासखण्ड के दूरस्थ ग्राम द्वारा मालदेवता निवासी संध्या रमोला ने जिलाधिकारी सविन बंसल के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रार्थना पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने बताया कि उनके पति गले के कैंसर से पीड़ित हैं तथा उनका उपचार हिमालय अस्पताल में चल रहा है। गंभीर बीमारी और लगातार कीमोथेरेपी के चलते उनके पति कार्य करने में असमर्थ हो गए हैं, जबकि परिवार के भरण—पोषण की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर निर्भर थी। संध्या ने अवगत कराया कि उनके दो छोटे बच्चे हैं, जिनमें एक की आयु लगभग तीन वर्ष तथा दूसरे की छह वर्ष है। लगातार इलाज, दवाइयों एवं घरेलू खर्चों के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में 45 हजार रुपये तथा वर्ष 2025 में 37 हजार रुपये का ऋण स्वयं सहायता समूह संचालन एवं स्वरोजगार हेतु बैंक से लिया गया था, किंतु पति की बीमारी के चलते वह ऋण की किश्तें जमा नहीं कर पाईं। परिणामस्वरूप बैंक द्वारा लगभग 71 हजार रुपये जमा करने का नोटिस जारी किया गया तथा एजेंटों द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने से परिवार मानसिक तनाव से भी गुजर रहा था। इसी के चलते उन्होंने जिलाधिकारी से ऋण माफी एवं आर्थिक सहायता की गुहार लगाई। जिलाधिकारी सविन बंसल ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जिला प्रशासन के सीएसआर फंड से 71 हजार रुपये की धनराशि सीधे ऋण खाते में जमा कराने के निर्देश दिए। साथ ही संबंधित बैंक को नो ड्यूज प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश भी दिए गए। इसके अतिरिक्त रायफल क्लब मद से संध्या रमोला के बैंक खाते में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से 50 हजार रुपये की अतिरिक्त आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई गई। जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप जनसमस्याओं का समाधान सर्वाेच्च प्राथमिकता है। ऐसे परिवार जो किसी कारणवश योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं अथवा आकस्मिक संकट का सामना कर रहे हैं, उन्हें जिला प्रशासन हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। जिला प्रशासन द्वारा समय—समय पर दिव्यांगजन, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों, निराश्रित महिलाओं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा आपात परिस्थितियों से प्रभावित नागरिकों को विभिन्न माध्यमों से सहायता प्रदान की जा रही है। प्रशासन की यह पहल शासन की जनकल्याणकारी सोच, संवेदनशील प्रशासनिक कार्यश्ौली एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रभावी उदाहरण बनकर सामने आ रही है।