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बैक डोर भर्तियों पर विवाद अभी भी

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विधानसभा और सचिवालय में 2016 के बाद हुई 228 नियुक्तियों को रद्द किए जाने का प्रकरण अब देश की सर्वाेच्च अदालत की दहलीज तक पहुंच कर समाप्त हो चुका है लेकिन इस इंसान को अभी भी आधा अधूरा इंसाफ ही माना जा रहा है विपक्ष कांग्रेस द्वारा अब सवाल उठाया जा रहा है कि 2016 से पूर्व की नियुक्तियों पर सरकार और विधानसभा अध्यक्ष खामोश क्यों हैं, कल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस पर सवाल उठाते हुए विधानसभा अध्यक्ष से पूछा है कि जब 2016 से पूर्व में हुई नियुक्तियां भी अवैध है तो उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा ने तो पत्रकार वार्ता कर स्पीकर ऋतु खंडूरी पर यह भी आरोप लगाया है कि वह अपनों का बचाव कर रही हैं। उनका कहना है कि जब विधानसभा में की गई सभी नियुक्तियां गैर कानूनी और अवैध तरीके से हुई है तो उनको नियमित किया जाना कैसे वैध माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि इन नियुक्तियों पर कार्यवाही करने से बचने के लिए भाजपा विधिक राय लेने का सहारा ले रही है सवाल यह भी है कि यह विधिक राय कब तक ली जाएगी। भले ही यह सब सही कि राज्य गठन के बाद सिर्फ विधानसभा और सचिवालय में ही नहीं बल्कि यूकेएसएसएससी तक से जो भी भर्तियां की गई हैं उन सभी भर्तियों में व्यापक स्तर पर धांधली और घपले हुए हैं तथा इन नियुक्तियों को किसी भी स्थिति में वैध नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन इस 20 साल के इतिहास के पन्नों को भी फाड़ कर रद्दी की टोकरी में नहीं फेंका जा सकता है। सरकार अब इन भर्तियों में हुए घपले घोटालों में हुए खुलासे के बाद यह भी तय नहीं कर पा रही है कि कौन सी भर्ती को सही माने और कौन सी भर्ती को गलत और किसे रद्द करें या उस पर रोक लगाएं और किसे यथावत बनाए रखें। इस पूरे भर्ती प्रकरण ने न सिर्फ प्रदेश के उन युवाओं को हैरत में डाल दिया है जो बीते समय में सरकारी नौकरी पाने के प्रयासों में लगे रहे हैं बल्कि उन्हें भी चौंका दिया है जो अभी भी सरकारी नौकरी का सपना संजोए बैठे हैं। जहां तक बात सूबे की सरकारों और सूबे के नेताओं की है तो इस पूरे प्रकरण ने उनकी छवि को तार—तार कर दिया है। भले ही इसे लेकर कांग्रेस आज भाजपा की घेराबंदी कर रही हो लेकिन उसके अपने कार्यकाल में वही होता रहा है जो भाजपा के कार्यकाल में हुआ है। इस सब के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बराबर की जिम्मेदार हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में स्पीकर रहे गोविंद सिंह कुंजवाल जिन्होंने अपने बेटे और बेटे की बहू को भी अवैध रूप से नौकरी देने का काम किया उन्हें भले ही इस अपराध के लिए कोई सजा न मिले लेकिन इस सूबे के युवा और आम लोग उन्हे कभी क्षमा करने वाले नहीं हैं। पूर्व स्पीकर प्रेमचंद्र अग्रवाल भले ही काबीना मंत्री बनकर यह समझ रहे हो कि उन्होंने कोई गलती नहीं की लेकिन इस पूरे प्रकरण में भाजपा और उनकी छवि को कितना नुकसान हुआ है इसका वह अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। 2016 से पूर्व की नियुक्तियों पर चुप्पी साध कर भले ही भाजपा सरकार और स्पीकर इस प्रकरण पर विराम लगाना चाहते हो लेकिन अगर इसके खिलाफ अभी भी किसी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो इन नियमित हो चुकी भर्तियों को भी रद्द किया जा सकता है।

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