June 16, 2026कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा हुई सक्रिय नितिन नवीन के मसूरी पहुंचते ही तेज हुई राजनीतिक चर्चाएं भाजपा-कांग्रेस के कार्यक्रम से पहले बढ़ा राजनीतिक तापमान देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन का अचानक मसूरी पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा इसे संगठनात्मक कार्यक्रम और नियमित गतिविधि बता रही है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसके समय और संदेश को लेकर कई मायने निकाल रहे हैं। मसूरी में नितिन नवीन की मौजूदगी ऐसे समय में सामने आई है जब कांग्रेस अपनी नई रणनीति के साथ संगठन को सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष का पहाड़ की राजनीति के केंद्र माने जाने वाले मसूरी में पहुंचना सियासी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने के लिए लगातार बैठकों और संवाद कार्यक्रमों पर जोर दे रहा है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व आगामी चुनाव को देखते हुए संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनसंपर्क अभियानों पर विशेष फोकस कर रहा है। मसूरी दौरे को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।दूसरी ओर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी का उत्तराखंड दौरा भी संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और 2027 के चुनाव को वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटा है। प्रभारी के दौरे के दौरान संगठन की समीक्षा और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों पर चर्चा होने की संभावना है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मसूरी केवल पर्यटन नगरी ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रही है। यहां होने वाली बैठकों और नेताओं की गतिविधियों को अक्सर बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है। नितिन नवीन का मसूरी दौरा भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के साथ-साथ विपक्ष को यह संदेश देने का प्रयास भी माना जा रहा है कि पार्टी चुनावी तैयारी में किसी भी स्तर पर पीछे नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की बढ़ती दिलचस्पी यह संकेत दे रही है कि उत्तराखंड का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों दल संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के दौरे और बढ़ेंगे तथा चुनावी गतिविधियां और तेज होंगी। अभी चुनाव में समय है, लेकिन नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकें और बढ़ती राजनीतिक सक्रियता यह साफ संकेत दे रही है कि उत्तराखंड में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की मसूरी मौजूदगी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है और दोनों दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा की झलक अभी से दिखाई देने लगी है।
June 16, 2026धारदार हथियार चले, कुछ घायल- बदरीनाथ हाईवे पर लगाया जाम चमोली। कर्णप्रयाग में बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर आज सुबह उस समय तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई जब यात्रा पर आए सिख समुदाय के कुछ यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच मामूली बात को लेकर विवाद हो गया। देखते ही देखते कहासुनी मारपीट में बदल गई और घटना ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें कुछ लोगों के घायल होने के समाचार है।जानकारी के अनुसार विवाद के दौरान कुछ यात्रियों द्वारा धारदार हथियार का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है। घटना में एक स्थानीय व्यापारी गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर पर गंभीर चोट आई है। घायल को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है।वहीं घटना की सूचना फैलते ही स्थानीय व्यापारियों और क्षेत्रवासियों में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साए लोगों ने पुलिस चौकी के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया और बदरीनाथ हाईवे पर जाम लगा दिया। इसके चलते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थिति को बिगड़ता देख प्रशासन ने एहतियातन कई यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर रोक दिया। क्षेत्र में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। अधिकारी लगातार स्थानीय लोगों और व्यापारियों से वार्ता कर माहौल को शांत करने का प्रयास कर रहे हैं।घटना के बाद स्थानीय व्यापार मंडल और नागरिकों ने प्रशासन के समक्ष कई मांगें रखी हैं। धार्मिक यात्राओं के दौरान धारदार हथियारों और अन्य घातक शस्त्रों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। स्थानीय व्यापारी पर हमला करने वाले आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। यात्रा मार्गों और सीमावर्ती क्षेत्रों में सघन चेकिंग अभियान चलाया जाए ताकि कोई भी व्यक्ति हथियार लेकर देवभूमि में प्रवेश न कर सके। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और स्थिति को नियंत्रित करने में जुटे हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है तथा घटना में शामिल लोगों की पहचान कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही हाईवे पर यातायात को जल्द सामान्य करने के प्रयास भी जारी हैं।
June 16, 2026सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए भाजपा की पैनी नजर, तो वापसी के लिए कांग्रेस का आक्रामक रुख देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने अभी से अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। दोनों दलों का सबसे बड़ा फोकस उन विधानसभा सीटों पर है, जहां पिछली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा जहां अपनी हारी हुई सीटों और बूथों की समीक्षा कर जीत की हैट्रिक का रास्ता तलाश रही है, वहीं कांग्रेस उन सीटों को दोबारा जीतने और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति बना रही है। भाजपा ने विशेष रूप से हारे हुए बूथों पर फोकस करने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का अभियान शुरू किया है।प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने अपनी पिछली हार का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया है। दोनों दलों के रणनीतिकार उन विधानसभा क्षेत्रों की फाइलें खंगाल रहे हैं, जहां पिछली बार हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करने और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि पिछली बार हारी हुई सीटों और कमजोर बूथों पर प्रदर्शन सुधारा गया तो 2027 का चुनाव अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी कारण संगठन स्तर पर बूथों की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय समीकरणों का आकलन किया जा रहा है।दूसरी ओर कांग्रेस को विश्वास है कि भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ती जन असंतुष्टि, बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अधूरे वादों के मुद्दे उसे राजनीतिक बढ़त दिला सकते हैं। कांग्रेस उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां पिछली बार जीत का अंतर कम रहा था। पार्टी स्थानीय नेताओं को सक्रिय करने और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा संगठन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चुनावी जीत का रास्ता बूथों से होकर गुजरता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हारे हुए बूथों और सीटों का विस्तृत विश्लेषण शुरू किया है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में उन कारणों की समीक्षा की जा रही है जिनकी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। स्थानीय नाराजगी, गुटबाजी, टिकट वितरण और संगठनात्मक कमजोरियों को चिन्हित किया जा रहा है।संगठन पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को गांव-गांव जाकर फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की नाराजगी को दूर कर एकजुटता का संदेश दिया जाए। कांग्रेस भी इस बार कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। पार्टी ने उन सीटों की सूची तैयार की है जहां जीत का अंतर बेहद कम रहा था। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यदि संगठन को मजबूत किया गया और स्थानीय मुद्दों को सही ढंग से उठाया गया तो कई सीटों पर तस्वीर बदल सकती है। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में जुटा है। कांग्रेस की रणनीति भाजपा सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को चुनावी समर्थन में बदलने की है।दोनों दलों में संभावित उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर भी नजर रखी जा रही है। जिन नेताओं की अपने क्षेत्रों में सक्रियता कम पाई जाएगी, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी संगठन अब केवल राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि जमीनी पकड़ और जनसंपर्क को भी टिकट का आधार बनाने की तैयारी में है। गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर तराई के मैदानी इलाकों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांवों की चौपालों, बाजारों और सामाजिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी बढ़ने लगी है। चुनाव भले दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।उत्तराखंड की राजनीति में यह दौर चुनावी तैयारी का पहला अध्याय माना जा रहा है। भाजपा अपनी सत्ता बचाने और इतिहास रचने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। फिलहाल दोनों दलों की नजर उन सीटों पर है जहां पिछली हार ने उन्हें सबक दिया था। आने वाले महीनों में यही सीटें चुनावी रणभूमि का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाली हैं।
June 16, 2026अधिकारी कार्यालय पर बैठ कर बना रहे योजनाएं, धरातल पर सब शून्य देहरादून। शहर ही नहीं राजपुर रोड भी जाम के झाम से अछूता नहीं है। जाखन जोहडी रोड पर आये दिन जाम से स्थानीय लोग परेशान है और अधिकारी कार्यालय में बैठकर जाम से जनता को निजात दिलाने की योजनाएं बनाने से पीछे नहीं दिखायी दे रहे हैं।उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड निर्माण और उसके बाद दून को अस्थायी राजधानी घोषित होने के बाद से जैसे इस शहर की किस्मत में जाम नाम का शब्द जुड गया हो। जो भी अधिकारी यहां पर आता है तो उसकी पहली प्राथमिकता जाम से शहर को निजात दिलाने की रहती है। लेकिन कुछ दिनों बाद वह शांत बैठना ही मुनासिब समझता है और वह जाम को भुलना ही सही मानता है। कई अधिकारी आये और नये—नये प्रयोग किये किसी ने शहर में रस्सियां लगाकर जाम को सुधारने का काम किया तो किसी ने अपने कार्यालय में पार्क बनाकर लोगों को एकत्रित कर यातायात के नियमों का पाठ पढाने का काम किया लेकिन सब फेल हो गये और शांत बैठ गये। इसी तरह से शहर के जाम को सुधारने वाले अधिकारी शहर के बाहर लगने वाले जाम से कैसे जनता को निजात दिलायेंगे यह सोचने की बात है। अब बात शहर से सटे जाखन क्षेत्र की ही ले लो। जाखन में जोहडी गांव जाने वाले रास्ते व मुख्य जाखन में आये दिन जाम के झाम से लोगों को झूझना पडता है। आसपास के गांवों के लोग अपने घर जाने के लिए जो समय उनको शहर से जाखन तक आने में लगता है उससे ज्यादा समय उनको जाखन से अपने घर जाने में लगता है। जाखन से जोहडी गांव, आवास विकास कालोनी व जाखन गांव के लोग इस जाम से काफी परेशान हंै। जबकि उस रास्ते पर मुख्य सचिव का आवास है। कई स्कूल है जिसमें अधिकारियों के बच्चे पढते हैं और अधिकारी अपने बच्चों को लेने ले जाने आते हैं। क्या उनको यह जाम दिखायी नहीं देता या फिर वह इसको देखने की जहमत उठाने को तैयार नहीं हैं। अब देखना है कि जनपद के अधिकारी कब जाखन वासियों को इस जाम के झाम से निजात दिलायेंगे। या फिर इस क्षेत्र के लोगों को ऐसे ही यातायात व्यवस्था को अपनी किस्मत समझकर शांत बैठना होगा। क्योंकि अधिकारी अपने कार्यालय में पंखे के नीचे बैठकर योजनाएं बनाने के अलावा धरातल पर कुछ करने को तैयार ही नहीं है।
June 16, 2026देहरादून। फूलचटृी में महिला को बचाते हुए एक युवक गंगा में डूब गया। सूचना मिलने पर एसडीआरएफ का सर्च अभियान शुरू किया लेकिन दोपहर होते होते युवक का पता नहीं चल सका है। जबकि रेस्क्यू अभियान अभी जारी है।बताया जा रहा है कि ऋषिकेश के फूलचटृी क्षेत्र में आज सुबह एक दर्दनाक हादसा हो गया। ग्वालियर से परिवार संग घूमने आए 30 वर्षीय श्ौलेन्द्र महावी गंगा नदी में डूबकर लापता हो गए। घटना सुबह करीब 9.30 बजे ह्यूंल नदी के मुहाने पर हुई।इस बात की जानकारी देते हुए एसडीआरएफ ढालवाला टीम के प्रभारी निरीक्षक कवींद्र सजवाण ने बताया कि श्ौलेन्द्र का परिवार फूलचटृी के पास गंगा में स्नान कर रहा था। यह स्थान प्रशासन द्वारा असुरक्षित घोषित है और यहां स्नान प्रतिबंधित है। इसी दौरान परिवार की 33 वर्षीय महिला सदस्य रेनू गुर्जर अचानक तेज बहाव में बहने लगीं। उन्हें डूबता देख श्ौलेन्द्र बिना एक पल गंवाए बचाने के लिए नदी में कूद गए। महिला तो किसी तरह सुरक्षित बाहर आ गईं, लेकिन श्ौलेन्द्र नदी की गहराई और तेज धार में बह गए।सूचना मिलते ही एसडीआरएफ ढालवाला की टीम रेस्क्यू उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और सर्च अभियान शुरू किया। महिला को एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया है। एसडीआरएफ की टीम संभावित क्षेत्रों में लगातार गहन तलाश कर रही है, पर समाचार लिखे जाने तक युवक का कोई पता नहीं चला है।
June 16, 2026विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा उत्तराखंड चुनाव 2027 है सत्ता से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई भाजपा बचाएगी साख, कांग्रेस तलाशेगी वापसी का रास्ता देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए नाक और साख का सवाल बनता जा रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटकर नया राजनीतिक इतिहास रचने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस एक दशक से चले आ रहे सत्ता के सूखे को समाप्त कर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की चुनौती से जूझ रही है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे साफ है कि दोनों दल इस मुकाबले को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रहे हैं। प्रदेश से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।उत्तराखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि प्रदेश में हर चुनाव में सरकार बदलती है। लेकिन 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। अब भाजपा की नजर तीसरी बार सत्ता हासिल करने पर है। यदि पार्टी ऐसा करने में सफल रहती है तो यह उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय होगा। मुख्यमंत्री, सरकार और संगठन सभी चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जा रहा है। भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लगातार तीसरी जीत पार्टी की नीतियों, संगठन और नेतृत्व पर जनता की मुहर मानी जाएगी।दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अस्तित्व और साख की चुनौती है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी लगातार सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि अपनी प्रासंगिकता साबित करने का अवसर भी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भर्ती घोटाले, भू-कानून और क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे वह जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। पार्टी नेतृत्व लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और संगठन को नई ऊर्जा देने में जुटा है। यदि कांग्रेस इस चुनाव में भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाती है तो पार्टी के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहा है।उत्तराखंड का चुनाव केवल प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की नजर भी इस चुनाव पर है। भाजपा के लिए यह प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व की लोकप्रियता को बरकरार रखने की परीक्षा होगी, जबकि कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुनरुत्थान की रणनीति को मजबूती देने का अवसर। इसी कारण दोनों दलों के राष्ट्रीय नेता लगातार उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों में दिल्ली की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता की संयुक्त परीक्षा होगा। भाजपा जहां अपने विकास कार्यों और योजनाओं के आधार पर जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए सत्ता बचाना और कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटना केवल चुनावी लक्ष्य नहीं, बल्कि नाक और साख का सवाल बन गया है।