July 28, 2026देहरादून। जिलाधिकारी, डॉ आशीष चौहान, ने प्रातःकाल नंदा की चौकी पुल का स्थलीय निरीक्षण किया। भारी वर्षा के कारण पुल से पहले एप्रोच रोड का एक हिस्सा धंस गया है, जिससे आवागमन प्रभावित हुआ है। जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई करते हुए मार्ग को सुरक्षित बनाकर शीघ्र ही यातायात के लिए पुनः सुचारु करने के निर्देश दिए।इसके उपरांत जिलाधिकारी ने शहर के विभिन्न क्षेत्रों का निरीक्षण करते हुए सोडा सरोली का दौरा किया, जहां वर्षा से क्षतिग्रस्त पीएमजीएसवाई सड़क को तत्काल खोलने के निर्देश दिए। वहीं, मलबा आने से बंद थानों मार्ग को त्वरित कार्रवाई करते हुए यातायात हेतु बहाल कर दिया गया है। जिलाधिकारी लगातार फील्ड में रहकर वर्षा से प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे हैं तथा राहत एवं पुनर्स्थापन कार्यों की मॉनिटरिंग करते हुए अधिकारियों को आवश्यक दिशा—निर्देश दे रहे हैं।
July 28, 2026देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय स्थित मुख्य सेवक सदन में उत्तराखण्ड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति—2024 के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में 06 प्राथमिक लाभार्थी वाहन स्वामियों को पूंजीगत अनुदान एवं प्रोत्साहन राशि के सब्सिडी चेक प्रदान किए। 05 अन्य लाभार्थियों की सब्सिडी एवं स्वीकृति प्रक्रिया भी परिवहन विभाग द्वारा पूर्ण की जा चुकी है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने स्वच्छ ईंधन आधारित 11 वाहनों का फ्लैग ऑफ किया।मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सहायता केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड को स्वच्छ, आधुनिक एवं पर्यावरण—अनुकूल परिवहन व्यवस्था की ओर ले जाने के राज्य सरकार के संकल्प का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस पहल से प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन आधारित सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा मिलेगा, डीजल चालित वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी आएगी तथा पर्यावरण संरक्षण को नई मजबूती मिलेगी।मुख्यमंत्री ने कहा कि आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे समय में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं स्वच्छ भविष्य सुनिश्चित करे।मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत हरित ऊर्जा एवं सतत विकास के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है। वर्ष 2070 तक नेट—जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य, लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट अभियान, पीएम ई—बस सेवा तथा सौर एवं अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों के विस्तार जैसे अनेक प्रयास पर्यावरण संरक्षण के प्रति देश की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड हिमालय की गोद में बसी देवभूमि है, जहां से गंगा एवं यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम होता है। प्रदेश की जैव विविधता, वन संपदा, नदियां एवं पर्वतीय प्राकृतिक धरोहरें पूरे देश की अमूल्य विरासत हैं। उन्होंने कहा कि इस पवित्र भूमि के पर्यावरण एवं प्राकृतिक संतुलन की रक्षा करना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।राज्य सरकार का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि विकास और पर्यावरण एक—दूसरे के पूरक हैं तथा पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास को गति दी जाएगी।मुख्यमंत्री ने कहा कि इसी सोच के अनुरूप राज्य सरकार ने उत्तराखण्ड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति—2024 लागू की है। इस नीति का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन को अधिक प्रभावी एवं आधुनिक बनाना, पुराने डीजल चालित वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना तथा सीएनजी एवं अन्य स्वच्छ ईंधन आधारित परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने विश्वास व्यत्तQ किया कि यह नीति प्रदेश में स्वच्छ, सुरक्षित एवं टिकाऊ परिवहन व्यवस्था की मजबूत आधारशिला सिद्ध होगी।मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार देहरादून, हरिद्वार एवं हल्द्वानी में इलेक्ट्रिक बसों के संचालन का लगातार विस्तार कर रही है। साथ ही प्रदेशभर में ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों के उपयोग के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में रोप—वे एवं आधुनिक अर्बन ट्रांसपोर्ट सिस्टम के विकास पर भी तेजी से कार्य किया जा रहा है, जिससे यातायात व्यवस्था अधिक सुगम, सुरक्षित एवं पर्यावरण—अनुकूल बनेगी तथा पर्वतीय क्षेत्रों में वाहनों का दबाव और प्रदूषण कम होगा।मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार केवल परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखण्ड को हरित विकास के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि पीएम सूर्य घर योजना के अंतर्गत प्रदेश में रूफटॉप सोलर संयंत्रों की स्थापना को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य ने 40 हजार रूफटॉप सोलर संयंत्रों का प्रारंभिक लक्ष्य निर्धारित समय से पूर्व प्राप्त कर लिया है तथा निर्धारित कुल लक्ष्य का लगभग 95 प्रतिशत कार्य पूर्ण किया जा चुका है। राज्य सरकार का लक्ष्य उत्तराखण्ड को स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन एवं सतत विकास के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में स्थापित करना है।मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जिन वाहन स्वामियों को सब्सिडी चेक प्रदान किए गए हैं, वे केवल इस योजना के लाभार्थी नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड में हरित परिवहन क्रांति के अग्रदूत हैं। उन्होंने विश्वास व्यत्तQ किया कि उनके इस प्रयास से अन्य वाहन संचालक भी स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनभागीदारी के बिना कोई भी परिवर्तन स्थायी नहीं हो सकता, इसलिए प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छ परिवहन के इस अभियान में सहभागी बनना होगा।इस अवसर पर परिवहन मंत्री श्री प्रदीप बत्रा, कैबिनेट मंत्री श्री गणेश जोशी, विधायक श्रीमती सविता कपूर, मेयर देहरादून श्री सौरभ थपलियाल, सचिव परिवहन श्री रविनाथ रमन, परिवहन विभाग के अधिकारी एवं अन्य गणमान्य उपस्थित थे।
July 28, 2026देहरादून। प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष आर्येंद्र शर्मा ने सहसपुर के नंदा की चौकी स्थित टोंस नदी पर बने लगभग 16 करोड़ रूपए की लागत वाले पुल की अप्रोच रोड 16 दिन में क्षतिग्रस्त होने को धामी सरकार के भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण का प्रमाण बताया।उन्होंने कहा कि 7 जुलाई को निरीक्षण के दौरान निर्माण कार्य में गंभीर खामियां सामने आई थीं और सरकार को आगाह भी किया गया था, लेकिन चेतावनी को नजरअंदाज कर 12 जुलाई को पुल जनता के लिए खोल दिया गया। अब पुल क्षतिग्रस्त होने से हजारों लोग प्रभावित हैं और विघार्थियों सहित आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आर्येंद्र शर्मा ने सरकार से सवाल किया कि 16 करोड़ खर्च होने के बावजूद पुल 16 दिन भी क्यों नहीं टिक पाया, निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है और जनता के पैसे की बर्बादी का जवाब कौन देगा? उन्होंने कहा कि यह घटना धामी सरकार के तथाकथित विकास मॉडल की पोल खोलती है।
July 28, 2026पुल ध्वस्त होने का जिम्मेदार व जवाबदेह कौन? देहरादून। राजधानी देहरादून के प्रेमनगर—नंदा की चौकी के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित नव—निर्मित पुल की एप्रोच रोड महज 16 दिन में धंस गई। एहतियात के तौर पर पुलिस ने पुल पर वाहनों की आवाजाही रोक दी है। पिछले वर्ष बरसात में बहने के बाद करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से इस पुल का पुनर्निर्माण कराया गया था। 13 जुलाई को पुल को यातायात के लिए खोला गया था। एप्रोच रोड पर बड़ा गड्ढा बनने से निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। सड़क क्षतिग्रस्त होने से क्षेत्र का देहरादून से सड़क संपर्क भी प्रभावित हुआ है। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और निरीक्षण शुरू किया। स्थानीय लोगों ने निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदार एजेंसियों पर नाराजगी जताई है। जिलाधिकारी ने मामले की जांच के निर्देश देते हुए कहा कि निर्माण में लापरवाही पाए जाने पर दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।गौरतलब है कि 11 जुलाई को टौंस नदी के तेज बहाव में ह्यूम पाइप से बनाई गई अस्थायी पुलिया बह गई थी। इसके बाद पीडब्ल्यूडी ने जल्दबाजी में मुख्य पुल को तैयार कर 13 जुलाई से यातायात के लिए खोल दिया था। अब एप्रोच रोड धंसने के बाद निर्माण की गुणवत्ता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।आम आदमी पार्टी ने प्रेमनगर में पुल के क्षतिग्रस्त होने की घटना पर गहरी चिंता और रोष व्यत्तQ किया है। पार्टी ने कहा कि लगभग 16 करोड़ की लागत से मरम्मत किए गए इस पुल की स्थिति यह है कि वह 16 दिन भी नहीं टिक पाया। पुल के क्षतिग्रस्त होने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई लोगों ने इस वीडियो के साथ धाकड़ धामी गीत जोड़कर सरकार की कार्यश्ौली पर सवाल उठाए हैं। आज प्रातः लगभग 6ः00 बजे आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद वरिष्ठ नेता शरद जैन तथा देहरादून कैंट अध्यक्ष वीर सिंह को पूरे मामले की जानकारी दी गई।वरिष्ठ नेता शरद जैन ने कहा कि यह केवल एक पुल का मामला नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही का गंभीर प्रश्न है। उन्होंने पूछा कि इस गंभीर लापरवाही के लिए आखिर जिम्मेदार और जवाबदेह कौन है? क्या इसके लिए लोक निर्माण विभाग मंत्री जिम्मेदार हैं, विभागीय अधिकारी जिम्मेदार हैं, देहरादून कैंट के विधायक जिम्मेदार हैं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जिम्मेदार हैं या पूरी राज्य सरकार?उन्होंने कहा कि इस मार्ग से प्रतिदिन अनेक स्कूलों और कॉलेजों के विघार्थी, स्कूल बसें, कार, मोटरसाइकिल, सार्वजनिक परिवहन तथा हजारों स्थानीय नागरिक आवागमन करते हैं। यदि पुल ध्वस्त होने से कोई बड़ा हादसा हो जाता और किसी की जान चली जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?आम आदमी पार्टी ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों एवं संबंधित जिम्मेदार व्यत्तिQयों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए तथा जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि भविष्य में जनता की सुरक्षा के साथ ऐसा खिलवाड़ दोबारा न हो।पार्टी ने कहा कि जनता के टैक्स के पैसे से बनने और मरम्मत होने वाले सार्वजनिक ढांचों में गुणवत्ता से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड की जनता यह जानना चाहती है कि पुल ध्वस्त होने का जिम्मेदार और जवाबदेह आखिर कौन है?
July 28, 2026हरीश रावत की एक पोस्ट से गरमाई राजनीति बहुगुणा परिवार पर छिड़ गई नई सियासी जंग इतिहास, विरासत और नेतृत्व पर बहस हुई तेज देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश, शक्ति प्रदर्शन और वैचारिक संघर्ष का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने राज्य की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। बहुगुणा परिवार का जिक्र करते हुए लिखी गई इस पोस्ट ने न केवल कांग्रेस के भीतर नई बहस को जन्म दिया है, बल्कि भाजपा को भी विपक्ष पर हमला करने का एक नया अवसर दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हरीश रावत को सार्वजनिक मंच पर ऐसी टिप्पणी करनी पड़ी, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई देने लगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट का नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, विरासत और राजनीतिक वर्चस्व की उस खींचतान का संकेत है, जो समय-समय पर सामने आती रही है।उत्तराखंड बनने के बाद से बहुगुणा परिवार का राज्य की राजनीति में विशेष प्रभाव रहा है। दूसरी ओर हरीश रावत भी कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में जब दोनों राजनीतिक धाराएं किसी मुद्दे पर आमने-सामने दिखाई देती हैं तो उसका असर केवल पार्टी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत की पोस्ट को कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। एक वर्ग इसे पार्टी के भीतर वैचारिक स्पष्टता की कोशिश बता रहा है, जबकि दूसरा इसे अनावश्यक विवाद मान रहा है। हालांकि किसी नेता ने खुलकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से फिलहाल परहेज किया है, लेकिन अंदरखाने चर्चाओं का दौर तेज बताया जा रहा है।उधर भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की आंतरिक कलह का नया प्रमाण बताते हुए हमला तेज कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस आज भी अपने अतीत के विवादों से बाहर नहीं निकल पाई है और पार्टी के वरिष्ठ नेता ही एक-दूसरे की राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर रहे हैं। भाजपा इस मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक जीवित रखने की रणनीति पर काम कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व हमेशा प्रभावी रहा है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता की सार्वजनिक टिप्पणी का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक एकजुटता पर भी पड़ता है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो कांग्रेस को चुनावी तैयारियों के बीच अनावश्यक राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राज्य में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। भाजपा लगातार संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी है। ऐसे समय पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकता है। सोशल मीडिया ने इस विवाद को और हवा दे दी है। समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्कों के साथ पोस्ट साझा कर रहे हैं। पुराने राजनीतिक घटनाक्रम, ऐतिहासिक फैसले और नेताओं के पुराने बयान फिर से चर्चा में आ गए हैं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस विवाद को व्यक्तिगत मतभेद बनने से रोके और संगठनात्मक एकता का संदेश दे। यदि पार्टी समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं करती है तो विरोधी दल इसे कांग्रेस की कमजोरी के प्रतीक के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे। उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है जब किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा किया हो। पिछले कुछ वर्षों में कई बार नेताओं की डिजिटल टिप्पणियां अखबारों की सुर्खियां और टीवी की बहस बन चुकी हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आज राजनीतिक लड़ाई केवल जनसभाओं में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ी जा रही है।फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की इस पोस्ट ने उत्तराखंड की राजनीति में नया विमर्श छेड़ दिया है। आने वाले दिनों में बहुगुणा परिवार की प्रतिक्रिया, कांग्रेस नेतृत्व का रुख और भाजपा की आक्रामक रणनीति इस विवाद की दिशा तय करेगी। 2027 के चुनावी रण से पहले यह सियासी टकराव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत, नेतृत्व और जनधारणा की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है।
July 28, 2026बारिश में राजधानी बेहाल, डीएम का अवकाश आदेश देर से आयाभीगते रहे छात्र-छात्राएं व मासूम नौनिहाल, जाम में फंसे अभिभावकसड़कें बनीं दरिया, स्कूल पहुंचे बच्चों को फिर लौटना पड़ा अपने घरसवाल जब आसमान रात से बरस रहा था तो फैसला सुबह देर से क्यों देहरादून। राजधानी में मूसलाधार बारिश ने केवल सड़कों को ही नहीं डुबोया, बल्कि प्रशासन की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए। सुबह से तेज बारिश के बीच हजारों बच्चे रोज की तरह स्कूल के लिए निकल पड़े। कई स्कूलों में प्रार्थना सभा भी हो गई, कक्षाएं शुरू हो गईं और तभी जिला प्रशासन की ओर से स्कूलों में अवकाश का आदेश जारी हुआ। नतीजा यह हुआ कि जिन बच्चों को सुरक्षित घरों में होना चाहिए था, वह बारिश, जलभराव और ट्रैफिक जाम के बीच फंस गए।राजधानी की कई प्रमुख सड़कें कुछ ही घंटों में नदी का रूप ले चुकी थीं। नालों का पानी सड़कों पर बह रहा था। वाहन रेंग रहे थे और जगह-जगह लंबा जाम लगा था। सबसे अधिक परेशानी उन अभिभावकों को हुई, जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल छोड़ दिया था। अवकाश की सूचना मिलते ही उन्हें दोबारा स्कूलों की ओर दौड़ लगानी पड़ी। कई परिवार घंटों तक जाम में फंसे रहे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे भीगते हुए स्कूल से घर लौटे।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा था और रात से ही राजधानी में तेज बारिश हो रही थी, तब अवकाश का निर्णय समय रहते क्यों नहीं लिया गया? यदि सुबह स्कूल खुलने से पहले आदेश जारी हो जाता, तो हजारों बच्चों और अभिभावकों को इस परेशानी से बचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है जब देहरादून में बारिश के दौरान प्रशासनिक निर्णयों के समय को लेकर सवाल उठे हों। हर मानसून में राजधानी की वही तस्वीर सामने आती है जलभराव, बंद नालियां, घंटों लंबा ट्रैफिक जाम और फिर आपात बैठकें। फर्क सिर्फ इतना है कि हर साल दावे नए होते हैं और समस्याएं पुरानी।अभिभावकों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारी नाराजगी देखी गई। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा फैसला सबसे पहले होना चाहिए। यदि प्रशासन मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा था, तो स्कूल खुलने से पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किया जाना चाहिए था। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों हुई।राजधानी की सड़कों की हालत ने भी नगर निकायों और संबंधित विभागों की तैयारियों की पोल खोल दी। जहां-जहां कुछ देर की बारिश में सड़कें तालाब बन गईं, वहां वर्षों से चल रहे ड्रेनेज सुधार और जल निकासी के दावों पर सवाल खड़े हो गए। लोगों का कहना है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने की योजनाओं की बात होती है, लेकिन पहली तेज बारिश ही पूरी व्यवस्था की वास्तविकता सामने ला देती है।अभिभावकों का कहना है कि मौसम आधारित निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध प्रोटोकाल होना चाहिए। यदि भारी बारिश की संभावना हो, तो स्कूलों में अवकाश या समय परिवर्तन का निर्णय सुबह बच्चों के घरों से निकलने से पहले लिया जाना चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति भी नहीं बनेगी और अनावश्यक जोखिम भी टाला जा सकेगा। राजधानी में आज जो हुआ, उसने एक बार फिर यह याद दिलाया कि आपदा केवल प्राकृतिक नहीं होती, कई बार निर्णय लेने में हुई देरी भी संकट को बढ़ा देती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बारिश कितनी हुई, बल्कि यह भी है कि प्रशासन ने समय पर फैसला क्यों नहीं लिया?देहरादून की सड़कों पर बहता पानी कुछ घंटों में उतर जाएगा, ट्रैफिक भी सामान्य हो जाएगा, लेकिन उन अभिभावकों के मन में उठे सवाल आसानी से नहीं मिटेंगे, जिन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित स्कूल भेजा था और कुछ ही देर बाद उन्हें बाढ़ जैसे हालात में वापस लाना पड़ा। मानसून हर साल आएगा, लेकिन क्या हर साल फैसले भी इतने ही देर से आएंगे यही सबसे बड़ा सवाल है।