राजनीतिक भगदड़ के निःतार्थ

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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने का समय शेष है लेकिन जिस तरह बीते एक सप्ताह के अंदर दो विधायकों के भाजपा में शामिल होने की बात सामने आई है तथा बहुत जल्द कुछ अन्य कांग्रेसी विधायक और कार्यकर्ताओं के भाजपा में जाने की चर्चाएं हवा में तैर रही हैं उससे ऐसा लगता है कि चुनाव आने तक कहीं कांग्रेस की सूबे में ऐसी स्थिति न हो जाए कि 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशियों की तलाश भी मुश्किल न हो जाए। पहले निर्दलीय विधायक प्रीतम पंवार और अब कांग्रेस के विधायक राजकुमार भाजपा का दामन थाम चुके हैं। यह समझ से परे है कि 2016 में पार्टी में हुए बड़े विभाजन के कारण रसातल में जा चुकी कांग्रेस अभी भी अपनी पार्टी के बचे कुचे नेताओं को एकजुट नहीं रख पा रही है। बात अगर पूर्व विधायक राजकुमार की करें तो कांग्रेसी नेताओं को कई दिन पहले से इसका पता चल चुका था लेकिन किसी ने भी उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया। पूर्व सीएम हरीश रावत जिनके कंधों पर 2022 के चुनाव का जिम्मा है वह उन्हें कमजोर कड़ी बता रहे हैं। सवाल यह है कि वह खुद कितनी मजबूत कड़ी अपने आपको मानते हैं 2017 के चुनाव में वह क्यों दो—दो सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी हार गए थे। अभी बीते दिनों 2016 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए 11 बड़े पूर्व कांग्रेसी नेताओं की भाजपा से नाराजगी की खबरें आई तो यह कयास लगाए जाने लगे कि इनमें से कुछ नेताओं की कांग्रेस में वापसी हो सकती है लेकिन हरीश रावत ने यह कहकर इस पर विराम लगा दिया है कि इन दलबदलुओं से सावधान रहने की जरूरत है। कल भी इस बारे में जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जो उन्हें लाना चाहते हैं वह रुके क्यों हैं शीघ्र से क्यों नहीं ले आते। मतलब साफ है कि उनकी मर्जी के बिना कोई किसी को कांग्रेस में ला नहीं सकता और वह किसी को भी कांग्रेस में लाने नहीं देना चाहते। 2017 के चुनाव में कांग्रेस के 11 विधायक थे जो अब सिर्फ नौ ही बचे हैं। इनकी संख्या कब आठ या फिर सात ही रह जाए कहा नहीं जा सकता। दरअसल कांग्रेसी नेता जिस नीति पर काम कर रहे हैं वही भाजपा के लिए मुफीद भी साबित हो रही है। भाजपा अधिक से अधिक प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं को तोड़कर उसे और अधिक कमजोर करने में जुटी है। भाजपा को इस बात का भी बखूबी अंदाजा है कि इससे उनकी पार्टी के नेताओं में भी असंतोष बढ़ रहा है जिसका बड़ा नुकसान हो सकता है लेकिन उसकी सोच यही है कि 5 का नुकसान और 10 का फायदा भी फायदे का ही सौदा है। कांग्रेस भले ही दावे कुछ भी क्यों न करें लेकिन जमीनी हकीकत को नकारा नहीं जा सकता है कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा सूबे में भाजपा के मुकाबले दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है यही कारण है कि कांग्रेस धीरे—धीरे एक व्यक्ति विशेष की पार्टी बनकर रह गई है। जो स्वयं से भी हार मान चुकी है।

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