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सरकारी मीट हलाल है या झटका?

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  • दून में एक भी सरकारी स्लाटर हाउस नहीं

देहरादून। उत्तराखंड की सरकार द्वारा राज्य में थूक जिहाद को रोकने के लिए जो कड़े कानून लागू किए गए हैं और सभी पुलिस अधिकारियों ने एडवाइजरी जारी की गई है उसमें सभी होटल, रेस्टोरेंटों व ढाबों में यह लिखने के निर्देश दिए गए हैं कि वह यह भी लिखे कि उनके यहां जो मीट मिलता है वह झटका है या फिर हलाल! सवाल यह है कि क्या सरकार के पास पहले से अपना कोई ऐसा तंत्र है जो झटका और हलाल की पहचान करता हो या सरकारी उपक्रमों से जो मीट बेचा जा रहा है उस पर सरकार ने ऐसे कोई मानक तय किए हुए है? अगर नहीं तो फिर होटल और ढाबों तथा रेस्टोरेंटों के लिए यह नियम क्यों?
उत्तराखंड की सरकार के पास राजधानी दून में अभी तक अपना एक स्लाटर हाउस तक तो है नहीं। मीट जहां से भी आता है क्या वहां सरकार खुद यह देखती है कि मीट झटका है या हलाल। इसकी पुष्टि सरकार कैसे करती है या करेगी? इसका कोई जवाब क्या सरकार के पास है।
राज्य के एक मंत्री ने जिन सरकारी उपक्रमों का उद्घाटन किया था ‘बकरा और उत्तरा फिश’ क्या उनकी वेबसाइट पर कहीं भी सरकार ने झटका और हलाल लिखा हुआ है। वह मांस मछली, मुर्गा कुछ भी बेच रहे हैं। सरकार पहले इन सरकारी उपक्रमों में तो इस नियम का पालन करा ले। एक और सवाल यह है कि क्या लिखने भर से ही तय हो जाएगा कि मीट झटका है या हलाल यह तो कसाई खाने में ही पता चल सकता है। सरकार का इससे बड़ा तुगलगी फरमान और क्या हो सकता है।

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