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अतिथि देवो भवः की संस्कृति पर चोट

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  • पर्यटकों और श्रद्धालुओं की गुंडागर्दी से आहत हो गई है देवभूमि
  • चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन में बढ़ रहे दुर्व्यवहार के मामले
  • स्थानीय के साथ मारपीट, अभद्रता और दबंगई की घटनाएं बढ़ी
  • सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो बढ़ा रहे सभी की चिंता
  • सरकार और प्रशासन पर समय रहते सख्ती नहीं करने के आरोप

देहरादून। सदियों से अपनी सरलता, सहनशीलता और अतिथि देवो भवः की परंपरा के लिए पहचाने जाने वाले पहाड़ के लोग आज भीतर ही भीतर रो रहे हैं, जिन पहाड़ों ने देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्र(ालुओं का खुले दिल से स्वागत किया, वहीं अब कई जगहों पर स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन के दौरान लगातार सामने आ रही घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि देवभूमि का धैर्य अब जवाब देने लगा है।
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां बाहरी राज्यों से आए कुछ पर्यटक और श्र(ालु स्थानीय लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं सड़क पर विवाद के दौरान मारपीट हो रही है तो कहीं होटल, ढाबों और टैक्सी चालकों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में महिलाओं और बुजुर्गों तक के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे हैं।
उत्तराखंड की संस्कृति हमेशा से मेहमानों के सम्मान की रही है। पहाड़ के लोग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद यात्रियों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं। आपदा हो या यात्रा का कठिन रास्ता, स्थानीय लोग हमेशा सहारा बनते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन के बढ़ते दबाव के साथ व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिला है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़ी संख्या में आने वाले कुछ पर्यटक पहाड़ को पर्यटन स्थल नहीं बल्कि मौज-मस्ती का मैदान समझने लगे हैं। शराब पीकर हुड़दंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, धार्मिक स्थलों की मर्यादा का उल्लंघन और स्थानीय लोगों के साथ अभद्रता जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं।
चारधाम यात्रा को आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। हर साल लाखों श्र(ालु बाबा केदार, बदरीविशाल, हेमकुंड, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यात्रा मार्गों पर कई बार श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों के बीच विवाद की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय व्यापारियों, टैक्सी चालकों और होटल संचालकों का कहना है कि कुछ लोग यात्रा पर श्र(ा से कम और दबंगई के प्रदर्शन के लिए अधिक आते दिखाई देते हैं। मामूली बातों पर गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है।
पहले ऐसी घटनाएं स्थानीय स्तर तक सीमित रह जाती थीं, लेकिन अब मोबाइल कैमरों और सोशल मीडिया ने पूरी तस्वीर सामने ला दी है। आए दिन ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े, सड़क पर हंगामा और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। इन वीडियो के बाद प्रदेशभर में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर देवभूमि की गरिमा को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार पर्यटन और यात्रा के आंकड़ों को लेकर तो उत्साहित दिखाई देती है, लेकिन उससे जुड़ी चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। पर्यटन बढ़ने के साथ कानून व्यवस्था, ट्रैफिक नियंत्रण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था की जरूरत है। कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त नियम नहीं बनाए गए तो स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। उनका मानना है कि उत्तराखंड केवल पर्यटन उद्योग नहीं बल्कि लाखों लोगों का घर भी है और उनकी गरिमा तथा सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हजारों परिवारों की आजीविका पर्यटन और यात्रा सीजन पर निर्भर है। यही कारण है कि कई बार अपमान और दुर्व्यवहार झेलने के बावजूद स्थानीय लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न हो जाए। लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि पहाड़ की खामोशी के पीछे गहरा आक्रोश दिखाई देने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ अनुशासन और जवाबदेही भी जरूरी है। जो लोग देवभूमि में आते हैं, उन्हें यहां की संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय समाज का सम्मान करना होगा। उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और मंदिर नहीं है। यह उन लोगों की भूमि है जिन्होंने सदियों से इन पहाड़ों को जिंदा रखा है। यदि स्थानीय लोगों का सम्मान और सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो इसका असर केवल समाज पर नहीं बल्कि पर्यटन और तीर्थाटन की पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा। आज पहाड़ मानो सरकार, प्रशासन और समाज से एक ही सवाल पूछ रहा है।

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