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एक देश-एक चुनाव पर ‘अनोखी रार’

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  • धार्मिक मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल पर कांग्रेस का वार, भाजपा का पलटवार
  • चुनावी सुधार की बहस में साधु-संतों के मंच से उठ गया उत्तराखंड से विवाद
  • संत समाज के मंच से वन नेशन, वन इलेक्शन पर उत्तराखंड में मचा घमासान

देहरादून। देश में वन नेशन, वन इलेक्शन की बहस चल रही है। सरकार और भाजपा इसे चुनावी व्यवस्था में सुधार, खर्च कम करने और बार-बार होने वाले चुनावों से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम बता रही हैं। कांग्रेस और विपक्ष इस पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड में बहस ने एक अलग मोड़ ले लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने साधु-संतों के मंच का राजनीतिक इस्तेमाल किया। अब सवाल सिर्फ वन नेशन, वन इलेक्शन का नहीं रह गया। सवाल यह भी है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक और आध्यात्मिक मंचों की भूमिका कहां तक होनी चाहिए? मंच पर साधु-संत हों, सामने श्रद्धालु हों और बीच में राजनीतिक संदेश पहुंच जाए तो इसे आस्था का संवाद कहा जाए या चुनावी राजनीति का विस्तार? यही वह सवाल है जिसे कांग्रेस ने उठाया है।
भाजपा के पास इसका अपना जवाब होगा। वह कह सकती है कि संत समाज भी देश और समाज का हिस्सा है, उसे राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में किसी वर्ग की आवाज को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता कि वह धार्मिक मंच से आ रही है। बात सही भी है। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा सवाल भी है क्या हर मंच चुनावी संदेश के लिए बनाया गया है? यहीं से बहस थोड़ी कठिन हो जाती है।
वन नेशन, वन इलेक्शन सुनने में बहुत सीधा लगता है। एक देश, एक साथ चुनाव। चुनाव कम होंगे, खर्च कम होगा, सरकारें लगातार चुनावी मोड से बाहर निकलकर काम कर सकेंगी। यह समर्थकों का तर्क है। विरोधियों के पास सवाल हैं। क्या एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और कानूनों में बड़े बदलाव नहीं करने पड़ेंगे? राज्यों की विधानसभाओं की अवधि का क्या होगा? अगर किसी राज्य की सरकार बीच में गिर जाए तो क्या होगा? क्या राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों को दबा देंगे? क्या मतदाता विधानसभा और लोकसभा के लिए अलग-अलग राजनीतिक पसंद को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाएगा? यह गंभीर सवाल हैं। लेकिन राजनीति अक्सर गंभीर सवालों को गंभीर बहस में बदलने के बजाय भावनात्मक बहस में बदल देती है और जब धार्मिक मंच उसमें शामिल हो जाता है तो बहस और मुश्किल हो जाती है।
भारत में साधु-संतों का सामाजिक प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धा से देखते हैं। इसलिए उनके मंच से निकला राजनीतिक संदेश सामान्य राजनीतिक सभा की तुलना में अलग असर पैदा कर सकता है। इसी कारण कांग्रेस का आरोप भी केवल मंच को लेकर नहीं है। असल चिंता यह है कि क्या धार्मिक आस्था को राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? लेकिन यहां विपक्ष के लिए भी एक सवाल है। अगर साधु-संत किसी राजनीतिक प्रस्ताव का समर्थन करते हैं तो क्या उनकी राय को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि वह धार्मिक मंच पर बैठे हैं? शायद नहीं।
लोकतंत्र में संत भी नागरिक हैं और उनकी राय भी राय है। समस्या राय रखने में नहीं, समस्या तब पैदा होती है जब आस्था को राजनीतिक समर्थन का प्रमाणपत्र बनाने की कोशिश हो। यानी किसी नीति का समर्थन इसलिए नहीं कि उसके पक्ष में तर्क हैं, बल्कि इसलिए कि उसके पीछे धार्मिक प्रतिष्ठा खड़ी कर दी गई है। फिर सवाल नीति से हटकर निष्ठा का हो जाता है और यही लोकतंत्र के लिए खतरनाक मोड़ है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में यह बहस और महत्वपूर्ण है। यहां धर्म, तीर्थ, संत परंपरा और राजनीति एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। चारधाम से लेकर कुंभ तक धार्मिक पहचान सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि मंदिर और मठ की श्रद्धा को विधानसभा की नीति से अलग रखकर भी दोनों का सम्मान किया जा सकता है। राजनीतिक दलों को यह दूरी बनाए रखने की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। क्योंकि अगर हर धार्मिक मंच चुनावी मंच बन गया, हर संत राजनीतिक प्रवक्ता बन गया और हर धार्मिक आयोजन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल गया तो फिर राजनीति से बाहर बचने वाली जगह बहुत कम रह जाएगी और तब जनता पूछेगी हमारे पास चर्चा करने के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और महंगाई जैसे मुद्दे हैं। इनके जवाब कौन देगा?
वन नेशन, वन इलेक्शन पर बहस होनी चाहिए। खुलकर होनी चाहिए। संसद में हो, विशेषज्ञों के बीच हो, राज्यों में हो और जनता के बीच हो। समर्थक अपने तर्क रखें, विरोधी अपने सवाल रखें। संविधान, संघवाद और चुनावी प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा हो। लेकिन फैसला तर्क से हो, तमाशे से नहीं। संतों के मंच की अपनी गरिमा है। राजनीतिक दलों के मंच की अपनी भूमिका है। दोनों को एक-दूसरे की जगह लेने की जरूरत नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसके मंच पर कौन बैठा था। सवाल यह होना चाहिए कि जो प्रस्ताव सामने है, वह देश और राज्यों के लोकतंत्र के लिए कितना सही है। वरना कल चुनाव एक होंगे, मंच एक होगा, नारे एक होंगे, लेकिन जनता के सवाल फिर भी अनेक रह जाएंगे और लोकतंत्र का असली चुनाव वहीं से शुरू होगा।

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