Home उत्तराखंड देहरादून लोकतंत्र का केंद्रीकरण

लोकतंत्र का केंद्रीकरण

0
79

देश में चुनावी व्यवस्था को बदलने की बहस कोई नई नहीं है, लेकिन एक देश, एक चुनाव का प्रस्ताव जिस तरह राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया है, उसने लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समर्थकों का तर्क है कि बार-बार होने वाले चुनावों से सरकारी मशीनरी और राजनीतिक दलों का समय, पैसा तथा संसाधन खर्च होते हैं। आदर्श स्थिति में यह तर्क आकर्षक लगता है। आखिर कौन नहीं चाहेगा कि देश में चुनावी खर्च घटे, प्रशासन लगातार चुनावी मोड में न रहे और सरकारें अपना पूरा कार्यकाल विकास पर ध्यान देकर पूरा करें? लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रशासनिक सुविधा का नाम नहीं है। लोकतंत्र में चुनाव जनता और सत्ता के बीच संवाद का सबसे बड़ा माध्यम हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि चुनाव कितनी बार हों, बल्कि यह होना चाहिए कि चुनावी व्यवस्था ऐसी हो जिससे जनता की आवाज लगातार सत्ता तक पहुंचती रहे। एक देश, एक चुनाव का सबसे बड़ा खतरा यही है कि कहीं सुविधा के नाम पर लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर न हो जाए। यदि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करा दिए जाते हैं तो पांच साल तक सत्ता के सामने जनता के पास चुनाव के जरिए हस्तक्षेप का अवसर सीमित हो सकता है। किसी राज्य में सरकार बेहद खराब प्रदर्शन कर रही हो, लेकिन उसका कार्यकाल राष्ट्रीय चुनाव चक्र से जुड़ा हो, तब क्या जनता को तत्काल राजनीतिक विकल्प मिलेगा? यह सवाल केवल संवैधानिक नहीं, लोकतांत्रिक भी है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राज्यों की अपनी राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताएं हैं। उत्तराखंड का मतदाता जिन मुद्दों पर वोट करता है, वह तमिलनाडु, पंजाब, असम या महाराष्ट्र के मतदाता की प्राथमिकताओं से अलग हो सकते हैं। कहीं बेरोजगारी बड़ा सवाल है, कहीं किसानों की समस्या, कहीं बाढ़, कहीं भाषा और क्षेत्रीय पहचान। एक साथ चुनाव होने की स्थिति में राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव राज्य के स्थानीय सवालों पर हावी होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि एक देश, एक चुनाव को केवल खर्च बचाने का गणित मानना लोकतंत्र की जटिलता को बहुत छोटा करके देखना होगा। चुनाव पर खर्च जरूर होता है, लेकिन चुनाव लोकतंत्र की कीमत भी हैं। सवाल यह है कि क्या खर्च घटाने के लिए लोकतांत्रिक अवसर भी घटाए जाएं? दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीतिक दलों के संसाधनों का है। एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने पर राष्ट्रीय दलों के पास प्रचार, संगठन और संसाधनों की ताकत अधिक होगी। क्षेत्रीय दलों के सामने मुकाबला और कठिन हो सकता है। भारत की राजनीति की खूबसूरती ही यही है कि यहां राष्ट्रीय दलों के साथ क्षेत्रीय दल भी जनता की आकांक्षाओं को आवाज देते हैं। यदि चुनावी व्यवस्था ऐसी बनती है जिसमें छोटे और क्षेत्रीय दल लगातार संसाधनों के दबाव में आते जाएं, तो इसका असर राजनीतिक विविधता पर पड़ सकता है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बार-बार चुनाव निश्चित रूप से प्रशासन पर दबाव डालते हैं। आचार संहिता लागू होने से कई नीतिगत फैसले प्रभावित होते हैं। राजनीतिक दलों को लगातार चुनावी अभियान में रहना पड़ता है और सरकारी मशीनरी को भी बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाया जाता है। चुनावी खर्च को नियंत्रित करना भी जरूरी है। लेकिन इन समस्याओं का समाधान केवल चुनावों की संख्या कम करना ही क्यों हो? चुनाव सुधारों के दूसरे रास्तों पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है। मसलन, राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता, चुनावी खर्च की वास्तविक निगरानी, डिजिटल प्रचार के नियमन, उम्मीदवारों के आपराधिक और वित्तीय विवरणों की प्रभावी निगरानी तथा निर्वाचन आयोग को और अधिक संस्थागत मजबूती देने जैसे विषय भी चुनाव सुधार का हिस्सा होने चाहिए। सबसे अहम बात यह है कि इस बहस को सत्ता बनाम विपक्ष के चश्मे से बाहर निकालना होगा। आज सत्ता में कोई और है, कल कोई और होगा। व्यवस्था किसी एक सरकार या दल के लिए नहीं बनाई जाती। कानून और संविधान भविष्य की सरकारों को भी नियंत्रित करते हैं। इसलिए एक देश, एक चुनाव पर फैसला तत्काल राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लोकतांत्रिक अधिकारों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। भारत ने अनेक राजनीतिक प्रयोग किए हैं और लोकतंत्र ने हर दौर में खुद को मजबूत किया है। जरूरत चुनाव कम करने की नहीं, चुनाव को अधिक पारदर्शी, सस्ता, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की है। यदि एक देश, एक चुनाव वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बनना है तो इसके केंद्र में सरकार की सुविधा नहीं, मतदाता की स्वतंत्रता और राज्यों की लोकतांत्रिक स्वायत्तता होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता केवल पांच साल में एक बार फैसला सुनाने वाली भीड़ नहीं है। वह हर दिन सवाल पूछने वाली नागरिक शक्ति है। चुनाव उस शक्ति की सबसे प्रभावी अभिव्यक्ति हैं। इसलिए चुनावी सुधार की दिशा ऐसी होनी चाहिए जिसमें चुनाव कम नहीं, लोकतंत्र अधिक मजबूत हो। एक देश, एक चुनाव पर फैसला जल्दबाजी में नहीं, व्यापक राजनीतिक सहमति, संवैधानिक विमर्श और जनता के विश्वास के साथ होना चाहिए। क्योंकि चुनाव का कैलेंडर बदलना आसान हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा से छेड़छाड़ की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here