किसी भी देश की संसद में अगर 16 घंटे लंबी चर्चा होती है तो वह मुद्दा कितना संवेदनशील है इसके लिए किसी तर्क की जरूरत नहीं है। अव्वल तो सरकार ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के लिए तैयार ही नहीं थी किसी तरह विपक्ष के भारी दबाव के बाद वह इसके लिए तैयार भी हुई तो जिस तरह के तर्क देश के रक्षा मंत्री, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा इस बहस के दौरान दिए गए तथा विपक्ष के नेताओं ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े जो अहम सवाल उठाए गए जिन्हें देश के लोग भी जानना चाहते थे उन सवालों का अनुउत्तरित ही रह जाना यह बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार कितनी गंभीर है और वह कैसे अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। भले ही मीडिया रिपोर्ट भी उस सच को दिखाने से बचती दिख रही हो लेकिन देश के उन लोगों के मन में स्थिति बहुत हद तक साफ जरूर हो गई है जिन्होंने भी इस मुद्दे पर हुई संसद कार्यवाही को लाइव टीवी पर देखा है। विपक्ष का पहला सवाल यही था कि जब भारत इस युद्ध या संघर्ष में जीत रहा था तब उसने युद्ध विराम (सीज फायर) का फैसला क्यों किया क्या यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव में लिया गया? इस सवाल पर सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक ने जो भी कहा गया वह न तो स्पष्ट था और न सच था। राहुल गांधी ने तो सदन में खुली चुनौती दी कि अगर प्रधानमंत्री मोदी में दम है तो वह सदन में कहें कि ट्रंप ने झूठ बोला है ट्रंप झूठे हैं। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने 29 बार यह कहा है कि उन्होंने परमाणु संपन्न दो देशों के बीच सीज फायर करा कर एक बड़े खतरे को टाल दिया है। इसके जवाब में राजनाथ ने सदन में खुद ही यह कहकर कि महज 21 मिनट में हमने अपना मिशन पूरा कर लिया और पाकिस्तान को कह दिया था कि वह कोई जवाबी कार्यवाही न करें अब हम भी हमले रोक देते हैं तथा हमने पाकिस्तान के सैनिक ठिकानों पर हमला नहीं किया, यह साफ कर दिया था कि ऑपरेशन सिंदूर का सच क्या था। पाकिस्तान द्वारा भारत के कितने जेट मार गिराये गये और इसमें भारतीय सेना को कितना नुकसान हुआ? इस सवाल का भी कोई साफ जवाब सरकार की तरफ से नहीं दिया गया। सत्ता में बैठे लोग जो यह दावा करते रहे हैं कि हमने इस ऑपरेशन में सेना को खुली छूट दी थी और हमारा कोई भी सैन्य नुकसान नहीं हुआ। उसका कैप्टन शिवकुमार इंडोनेशिया में सार्वजनिक मंच से पहले ही बता चुके हैं कि हमारे कितने जेट मार गिराए गए यह संख्या कितनी थी यह भले ही उन्होंने न बताई हो लेकिन हमारे जेट को नुकसान हुआ है उन्होंने इसका कारण भी बताया कि ऐसा राजनीतिक प्रतिबंध के कारण हुआ क्योंकि हमें केवल आतंकी ठिकानों पर ही हमले का आदेश था सैन्य ठिकानों पर नहीं। एक अन्य सवाल पहलगाम में सुरक्षा एजेंसियों की विफलता का था पहलगाम हमले की जानकारी समय रहते क्यों नहीं थी? और अगर थी तो वहां सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं थे? इसका जवाब भी सरकार इस चर्चा में नहीं दे सकी। इसे इत्तेफाक कहा जाए या फिर एक सुनियोजित षड्यंत्र जिसे लेकर भी अब सवाल उठना लाजिमी है कि पहलगाम की घटना के बाद से लेकर ऑपरेशन सिंदूर जैसी बड़ी कार्यवाही के बावजूद भी पहलगाम के दोषी आतंकी 100 दिन तक क्यों सुरक्षा बलों के हत्थे नहीं चढ़े वह 100 दिनों तक कश्मीर की सैर करते रहे और सिंदूर पर चर्चा वाले दिन ही सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें मुठभेड़ में मार गिराया। यह अविश्वसनीय इसलिए भी है क्योंकि सुरक्षा बल एक छोटे राज्य में छिपे रहने वाले इन आतंकियों को इतने दिनों में भी क्यों नहीं ढूंढ पाई क्या यह आतंकी इसीलिए कश्मीर में 100 दिनों तक छिप रहे थे कि सेना उन्हें ढूंढ कर मार सके? बहुत सारे सवाल हैं जिनके उत्तर सरकार के पास नहीं है। लेकिन इन अनुत्तरित सवालों का बड़ा सच इस चर्चा ने जनता को दे दिया है।




