हिंदुत्व की हार्डकोर राजनीति देश और समाज को किस ओर ले जा रही है इस बात से भाजपा और उसके नेताओं को कोई सरोकार नहीं है। सत्ता में बने रहने और अपनी निजी और व्यत्तिगत राजनीति को चमकाने में जुटे भाजपा नेता किसी की कोई बात मानना तो दूर, बात सुनने तक को तैयार नहीं है। धार्मिक उन्माद की जो लहर बीते एक दशक में पूरे देश और प्रदेश में तेजी से आगे बढ़ रही है उसके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज को भोगने पड़ेंगे इसलिए आम जनता को अपने आसपास घटित होने वाली तमाम घटनाओं और दुर्घटनाओं को लेकर सजग रहने की जरूरत है। धर्मनगरी हरिद्वार में मनसा देवी मंदिर मेंं हुई भगदड़ में आठ लोगों की जाने चली गई। इस दुर्घटना में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वरान्द महाराज ने कहा है कि तीर्थ स्थलों को पर्यटन नगरी न बनाया जाए। आप और हम बीते कुछ समय से उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की जो कवायत देख रहे हैं उससे भली प्रकार से अवगत है। बात चाहे चारधाम ऑल वेदर रूट की हो या फिर मंदिर माला प्रोजेक्ट की जिसके तहत उत्तराखंड के मंदिरों को जोड़ने की बात हो रही है। तीर्थ स्थलों पर भीड़ का इतना दबाव बढ़ चुका है कि हर एक तीर्थ स्थल एक मायावी नगरी में बदलता दिख रहा है। तीर्थ स्थल के पर्यटन स्थलों में तब्दील होने के कारण आस्था भत्तिQ और श्रद्धा का हस हो रहा है और यह तीर्थ स्थल या तो मौज—मस्ती का केंद्र बनते जा रहे हैं या फिर धार्मिक उद्वेग का स्थल। यह अति स्वाभाविक है कि जहां लाखों और करोड़ की भीड़ जमा होगी वहां धर्म व धार्मिक आस्था के लिए क्या कोई स्थान शेष बचेगा। यह भीड़ सिर्फ धक्का मुक्की व छेड़छाड़ के अलावा और क्या कर सकती है एक अन्य सवाल यह है कि उत्तराखंड के तमाम मठ और मंदिरों के आने—जाने के रास्ते कितने सरल और सुगम है? बात सिर्फ मनसा देवी मंदिर के सैकड़ो साल पुराने संकरे रास्ते की नहीं है जहां हुई भगदड़ के बाद अब सरकार द्वारा सभी मंदिरों के रास्ते से अतिक्रमण हटाने और उनके चौड़ीकरण के निर्देश दिए गए हैं। सरकार द्वारा की गई इस घोषणा का कितना असर होगा यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन अपने डेमोग्राफिक चेंज को रोकने के फैसले से लेकर सभी मंदिरों के लिए समितियां बनाने के आदेशों तक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ चुके थे। वह चाहे धर्मांतरण के खिलाफ और सख्त कानून बनाने की बात कर रहे हो या फिर अवैध मदरसों और मजारों की ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए राज्य के डेमोग्राफी में चेंज न आने देने का दावा कर रहे हो, उनके इन सभी प्रयासों से उन्हें एक पक्के हिंदुत्ववादी नेता के रूप में बुलंदियों के शिखर तक लाकर खड़ा कर दिया है। उत्तराखंड में उनके द्वारा जो नए—नए प्रयोग किए गए हैं उससे राज्य के आर्थिक और सामाजिक हालात कितने सुदृढ़ होंगे यह तो समय ही बताएगा लेकिन उनका अपना राजनीतिक ग्राफ जरूर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। धार्मिक उन्माद की राजनीति आम आदमी के लिए न कभी कल्याणकारी रही है न रहेगी इसमें किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता है।




