देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात क्या हो चले हैं? यह सवाल आज हर उस आदमी के मन को मथने वाला है जिन्हें राजनीति की समझ है या देश के आम आवाम के हालात की जमीनी जानकारी है। सबसे खास बात यह है कि जिस आम आदमी के वोट से देश की राजनीति चलती है और राजनीतिक दल और नेता सत्ता का सुख भोग करते हैं उन्हें अब जनता के दुख दर्द से ज्यादा खुद को सत्ता में बनाए रखने की ही चिंता है और वह उसकें लिए किसी भी सीमा तक जाने को तत्पर बैठे हैं। मणिपुर में जो कुछ हुआ उसे देश ही नहीं सारे विश्व ने देखा अगर किसी को कुछ नहीं दिखा तो वह सिर्फ केंद्र की सत्ता में बैठे नेताओं को नहीं दिखा। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जो कुछ हुआ है उसे भी देश और दुनिया भर के लोग देख रहे हैं अभी बीते दिनों जिन राज्यों में चुनाव हुए थे उससे पूर्व इन राज्यों के मुख्य विपक्षी दलों के नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाल देने तथा ईडी और सीबीआई के बेजां इस्तेमाल को देशभर के लोग देख चुके हैं। 2012 के नेशनल हेराल्ड केस में जिसमें 3 साल पहले ईडी द्वारा राहुल गांधी से लगातार 5 दिन में 50 घंटे तथा सोनिया गांधी से 20 घंटे पूछताछ की जा चुकी है उसमें अब बिहार के चुनाव से पूर्व ईडी द्वारा चार लोगों के नामजद आरोप पत्र दाखिल किए गए हैं। जिसमें नॉन—वेलेबल धाराएं लगाई गई है जो राहुल गांधी और सोनिया गांधी को जेल पहुंचा सकती हैं। ईडी की इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक तबका और इस देश का समाज दो हिस्सों में बंट चुका है आधे लोग जो भाजपा और सरकार समर्थक है उनका कहना है कि भ्रष्टाचारियों को सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी। यह सही भी है भ्रष्टाचारियों को सजा मिलनी ही चाहिए लेकिन सवाल यह है क्या सारे भ्रष्टाचारी नेता सिर्फ विपक्षी दलों में ही बैठे हैं सत्ताधारी दल और उसके सहयोगी दलों में अब कोई भ्रष्टाचारी नेता है ही नहीं। अगर है तो यह भी बताया जाना चाहिए कि बीते 10 सालों में सत्ता पक्ष के कितने भ्रष्टाचारी नेताओं पर ईडी ने छापेमारी की उनकी गिरफ्तारी की या उन्हें जेल भेजा गया और अगर नहीं की गई तो क्यों? मगर यह सवाल वर्तमान दौर में कोई नहीं पूछ सकता है? सवाल यह भी है कि ईडी ने जब राहुल और सोनिया गांधी से इतनी लंबी पूछताछ की थी और ईडी को उनके आर्थिक अपराध के सबूत मिल चुके थे तो उन्हें तभी गिरफ्तार कर जेल क्यों नहीं भेजा गया। देश में धक्का मुक्की की यह राजनीति जिस तरह से पनप रही है उसे देश के भविष्य के लिए सही नहीं माना जा सकता है। आधे लोग और नेता ऐसे हैं जो इस ईडी की कार्रवाई को राजनीतिक विद्वेश की और बदले की भावना से की गई कार्रवाई मान रहे हैं। तब क्या सरकार यह चाहती है कि देश के लोग अब सड़कों पर आधे इधर और आधे उधर खड़े होकर धक्का मुक्की पर उतर आए। तथा जो वक्फ बोर्ड के मामले में हो रहा है वैसा ही हर मामले में हो। यह अत्यंत ही चिंतनीय व सोचनीय हालात है।




