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बारह मासा पर्यटन

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बीते कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तराखंड दौरे पर आए तो थे शीतकालीन चारधाम यात्रा के प्रमोशन के लिए, लेकिन हर्षिल में जनसभा को संबोधित करने के लिए मंच पर पहुंचते—पहुंचते उन्होंने शीतकालीन यात्रा के कांसेप्ट को बारहमासी पर्यटन में तब्दील कर दिया। मोदी के 30—35 मिनट के इस भाषण में उनका पूरा फोकस सर्वकालिक पर्यटन पर ही बना रहा। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में यह बता दिया कि जब तक हर सीजन को पर्यटन सीजन के रूप में अस्तित्व में नहीं लाया जाएगा तब तक प्रदेश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ नहीं बनाया जा सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस साल शीतकालीन चारधाम यात्रा को शुरू किया गया है तथा उनका दृष्टिकोण धार्मिक पर्यटन तक ही सीमित था लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के जरिए जो विस्तारीकरण देने का सुझाव दिया गया है तथा इसे धार्मिक पर्यटन की परिधि से आगे ले जाने की बात कहते हुए इसमें डेस्टिनेशन वेडिंग, फिल्म, साहसिक खेल और गतिविधियों, वैलनेस सेंटर बनाने तथा वाइल्डलाइफ डेस्टिनेशन डेवलप करने, उघमियों को पहाड़ों की वादियो में सेमिनार आयोजित करने की राय दी गई है, वह यह बताने के लिए काफी है कि आप सिर्फ धार्मिक टूरिज्म पर निर्भर रहकर पर्यटन को बारहमासा नहीं बना सकते हैं। आपको इसमें अन्य तमाम उपरोक्त विषयों या क्षेत्रों को भी जोड़ना पड़ेगा तभी आप पूरे साल हर एक सीजन में पर्यटकों को आकर्षित करने में सफल हो सकते हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जिन मुद्दों को छुआ उसमें बेहतर होमस्टे की योजना तथा होटल व्यवस्थाएं भी शामिल थी। यह बड़ी साफ बात है कि जब तक आप पर्यटकों को बेहतर सेवाएं और सुविधा नहीं दे सकते तब तक आप पर्यटन को बढ़ा नहीं सकते हैं। विडम्बना यह है कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी सूबे की सरकारें यह तय नहीं कर सकी है कि वह इस राज्य को किस रूप में विकसित करना चाहती हैं। कभी इसे ऊर्जा प्रदेश तो कभी धार्मिक पर्यटन का केंद्र तो कभी आयुष प्रदेश तो कभी योग और अध्यात्म का केंद्र बनाने की कोशिश की जाती है, नतीजतन उत्तराखंड अभी तक किसी एक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान नहीं बना सका है। केंद्र सरकार को जो करना चाहिए था उसने उससे कई गुना अधिक राज्य के विकास के लिए किया है किंतु राज्य सरकारों की सहभागिता अत्यंत ही कम रही है। वर्तमान समय में राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में हम जो भी प्रगति देख रहे हैं वह सब कुछ केंद्र सरकार की देन है। बात चाहे सड़कों की हो या रेलवे के विकास की या एयर कनेक्टिविटी की अथवा स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की हो या फिर धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण कार्यों की। सब कुछ केंद्र सरकार का ही किया हुआ है। राज्य सरकार की आज भी केंद्र सरकार पर जिस तरह की निर्भरता बनी रहती है वह किसी से छुपा नहीं है। उत्तराखंड को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनना है तो उसे अपने विकास का लक्ष्य निर्धारित करना ही होगा। सर्वकालिक पर्यटन की अवधारणा पर अगर ईमानदारी से काम किया जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि उत्तराखंड बहुत जल्द विकसित राज्य बन सकता है। क्योंकि अब राज्य में इसकी ढांचागत तैयारी काफी हद तक पूरी की जा चुकी हैं।

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