उत्तराखंड जो अभी कुछ समय पहले तक उत्तर प्रदेश का हिस्सा था अपने प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण स्वच्छता के लिए देश ही नहीं विश्व भर में अपनी एक अलग पहचान रखता था। बात अगर दून घाटी की जाए तो देहरादून शहर अपने पर्यावरणीय सौंदर्य और शिक्षा की गुणवत्ता के कारण देश के उन शहरों में शुमार किया जाता था जहां सबसे स्वच्छ आबो हवा का और शांति का एहसास होता था। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद जिस तेजी से दून के पर्यावरण में जो परिवर्तन आया है वह अत्यंत ही विस्यमयकारी है। जिसने भी 30 साल पहले के उत्तराखंड और दून घाटी को देखा है उन्हें यह स्थिति परिवर्तन इतना अधिक खलता है कि वह बरबस ही यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि विकास के नाम पर यह कैसा विनाश हो रहा है? या यह कहे कि यह विकास है अथवा विनाश है, तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। कुछ पर्यावरण प्रेमियों द्वारा दून में ऋषिकेश हाईवे निर्माण के लिए 3000 से अधिक पेड़ों का कटान रोकने को लेकर शांति मार्च निकाला गया। इस मार्च से पेड़ों का कटान रूक पाएगा यह संभावना बहुत कम है क्योंकि सरकार विकास के कामों को किसी भी कीमत पर रोकना नहीं चाहती है दून से ऋषिकेश की दूरी का 15 मिनट का समय कम होना ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय 3000 पेड़ काटने के। अगर ऐसी सोच न रही होती तो दून में आम और लीची के पेड़ अभी बसंत काल में अपनी भीनी—भीनी मादकता बिखेर रहे होते और घाटी में बासमती की फसल लहलहा रही होती जो विश्व भर में अपने नाम से जानी जाती थी। पहाड़ के पर्यावरण को बनाए रखने और बचाए रखने के लिए पर्यावरण प्रेमियों ने बहुत प्रयास किए हैं चिपको आंदोलन से लेकर बीते कल किए गए शांति मार्च तक इसका एक लंबा इतिहास है लेकिन उनकी आवाज अब विकास की इस अंधी दौड़ के समय में कोई सुनने वाला नहीं है। पहाड़ के जंगलों में अब हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट तो सुनी जा सकती है लेकिन पक्षियों की पहचान और जंगली जानवरों की वह आवाज गायब हो चुकी है। 1990 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दून के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जो विशेष दिशा निर्देश दिए गए जिसमें माईनिंग पर रोक, वृक्षो के कटान पर तथा सेलेटर हाउस पर प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं की गई थी अब विकास के नाम पर उन सभी को तोड़ दिया गया है ऐसी स्थिति में अगर आप यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उत्तराखंड को उसके मूल स्वरूप में लौटा पाना संभव है तो वह आपका भ्रम ही कहा जा सकता है वास्तविकता यह है कि पर्यावरण सुरक्षा की खेती को तो चिड़िया पहले ही चुग चुकी है स्टोन क्रशरों की गड़गड़ाहट को सुनिए, रेल और हेलीकॉप्टर तथा रेल के सफर को तैयार रहिए भले ही एक दिन दून में भी दिल्ली जैसा दम गोटू वातावरण क्यों न हो जाए। आपकी बात को अब कोई सुनने वाला नहीं है क्योंकि आप विकास के उसे घोड़े पर सवार हो चुके हैं जिसकी लगाम आपके हाथों में नहीं है। विकास का यह रास्ता भले ही आपको व आने वाली पीढियां को विनाश की भटृी में झौंक दे।


