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भावी राजनीतिक भविष्य का चुनाव

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विवादों के बीच घिरे चुनाव आयोग द्वारा कल शाम महाराष्ट्र तथा झारखंड विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है। इसके साथ ही 13 राज्यों की 47 विधानसभाओं की सीटों पर उपचुनाव की तारीखें भी तय कर दी गई है जिसमें उत्तराखंड की एक केदारनाथ विधानसभा सीट भी शामिल है। 13 नवंबर से 20 नवंबर के बीच होने वाले इन चुनावों के साथ ही केरल के वायनाड और नांदेड़ संसदीय सीटों पर चुनाव कराए जा रहे हैं। दरअसल यह चुनाव एक ऐसे समय में हो रहे हैं जब देश में लोकतंत्र की रक्षा और चुनाव आयोग की निष्पक्षता के सवाल 2024 में हुए लोकसभा चुनावों से अधिक गंभीर हो चुके हैं। हरियाणा के विधानसभा चुनावी नतीजों के बाद चुनाव आयोग पर आम जनता से लेकर राजनीतिक दलों ने इतने सवाल खड़े कर दिए हैं कि अब देश की सुप्रीम कोर्ट यह मामला पहुंच चुका है और प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज करने वाली भाजपा हरियाणा में अभी तक नई सरकार का शपथ ग्रहण तक नहीं करा सकी है। वहीं दूसरी ओर देश भर में सांप्रदायिक टकराव और तनाव की स्थितियां बनी हुई है। चुनाव आयोग को समय पर चुनाव कराने की मजबूरी भी है। महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल नवंबर के अंतिम सप्ताह में समाप्त होने जा रहा है जबकि इन चुनावी के नतीजों के लिए 23 नवंबर की तिथि तय की गई है। यानी कि सरकार गठन के लिए एक सप्ताह का भी समय नहीं मिल सकेगा। इत्तेफाक से अगर यहां किसी दल को बहुमत के लिए जरूरी सीटें नहीं मिल पाई तो राष्ट्रपति शासन लागू करने की नौबत भी आ सकती है। चुनाव आयोग को चुनाव का कार्यक्रम तय करने का अधिकार है। वह जब जो चाहे वह कराये। महाराष्ट्र में चुनाव एक ही चरण में कराये जा रहे हैं जबकि झारखंड में दो चरणों में होंगे। चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव कराए गए थे। लोगों का आमतौर पर यही मानना है कि सत्ताधारी दल द्वारा चुनाव आयोग को अपनी सहूलियत के हिसाब से ही चुनाव तक कराये जाते हैं। इस चुनाव में इंडिया गठबंधन का भविष्य भी तय होने वाला है क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद दो राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे में हरियाणा को गंवाया जा चुका है यहां कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने पर भी सहयोगी दलों ने कांग्रेस की भारी खिलाफत की थी। महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव इंडिया गठबंधन लड़ रहा है अगर इन चुनावों में भी उसका प्रदर्शन बेहतर नहीं रहता है तो इसका अस्तित्व समाप्त हो सकता है। रही बात भाजपा और एनडीए की उसके भविष्य पर भी यह चुनावी नतीजे गंभीर प्रभाव डालने वाला है। उत्तराखंड की बात करें तो 2022 के बाद राज्य में चार विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं जिनमें से दोनों ही दो—दो सीटें जीत चुके हैं लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने पहली बार मंगलौर और बद्रीनाथ की सीटों पर जीत दर्ज की थी इससे पहले सभी उपचुनाव बीजेपी ने ही जीते थे। लेकिन पहली बार सत्ता से बाहर होते हुए भी इन दो सीटों पर जीत को कांग्रेस अपनी बड़ी सफलता ही नहीं मान रही है बल्कि वह प्रदेश में भाजपा विरोधी हवा को लेकर ज्यादा आश्वस्थ नजर आ रही है और केदारनाथ सीट पर अपनी जीत को पक्का मान बैठी है जबकि भाजपा एक बार दो सीटों पर हार के बाद तीसरी सीट पर किसी भी कीमत पर हार मानने को तैयार नहीं है। क्योंकि इसका संदेश भी फैजाबाद (अयोध्या) की संसदीय सीट जिसे जीतकर सपा ने तहलका मचा दिया और फिर बद्रीनाथ सीट पर कांग्रेस की जीत को इसी जीत से जोड़ दिया गया और विपक्षी नेता इसको बीजेपी की धर्म की राजनीति की हार के रूप में प्रचारित करते रहे हैं। इसलिए केदारनाथ का उपचुनाव अब भाजपा और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है और इस सीट पर दोनों ही दलों ने अपनी पूरी ताकत झौंक रखी है। ठीक वैसे ही कांग्रेस के लिए वायनाड की संसदीय सीट भी हॉट सीट बनी हुई है क्योंकि यह राहुल गांधी के इस्तीफे से खाली हुई है और प्रियंका गांधी यहां से कांग्रेस प्रत्याशी है।

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