केंद्र सरकार द्वारा देश में एक साथ लोकसभा व विधानसभा चुनाव कराने की जो पहल शुरू की गई उसे लेकर बहस छिड़ना स्वाभाविक है। यह सच है कि देश की आजादी के बाद 1952 में हुए पहले चुनाव एक साथ कराये गये थे तथा यह प्रक्रिया 1987 तक चलती रही। लेकिन इसमें सवैधानिक और व्यवहारिक समस्याएं आने के कारण विधानसभा और लोकसभा की चुनाव अलग होने लगे। 1951 में हुई पहली जनगणना के अनुसार उस समय देश की आबादी 36 करोड़ के आसपास बताई गई थी जो वर्तमान में 140 करोड़ के आस—पास पहुंच चुकी है। जो अनुमानित है क्योंकि 2021 में जनगणना नहीं हो सकी है। लेकिन एक बात साफ है कि इस बढ़ती आबादी वाले देश की स्थितियों व परिस्थितियों में अमूल चूल बदलाव बीती आधी सदी में आया हैै। प्रधानमंत्री से लेकर गांव प्रधान तक के चुनावो को एक साथ कराने की बात में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब लोकसभा के चुनाव सात सात चरणों में कराए जाते हैं और चुनावों की प्रक्रिया को पूरा करने में तीन से चार माह तक का समय लग जाता है अगर राज्यों के विधानसभाओ के चुनाव भी इसके साथ कराये जाएंगे तो इसमें कितना अधिक समय और संसाधनों की जरूर होगी? किसका अनुमान लगाया जा सकता है। वन नेशन वन इलैक्शन की व्यवस्था को शायद भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में धरातल पर उतारने में तमाम तरह की व्यवहारिक दिक्कतों का सामने आना स्वाभाविक है। अगर देश के सभी विभागों के कर्मचारियों और सशस्त्र बलों को भी चुनावी काम में जुटा दिया तब भी यह संभव नहीं लगता है और फिर महीनों तक पूरे देश के कर्मचारी व सुरक्षा कर्मी चुनाव में जुटे रहेंगे तो सरकारी कामकाज तो पूरी तरह से ठप ही हो जाएगा वही इलेक्शन कमीशन से लेकर चुनाव के जरुरी संसाधन वह भले ही वोटिंग मशीनें ही क्यों न हो उन्हें कम से कम 10 गुना बढ़ाने की जरूरत होगी। स्वीडन, जर्मनी फिलीपींस जैसे छोटे देशों में ही एक चुनाव की व्यवस्था कामयाब हो सकती है भारत जैसे बड़े देश में इसे लागू करना आसान नहीं होगा। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि वन नेशन वन इलेक्शन की इस व्यवस्था को लागू करने के लिए देश के सविधान में लगभग 18 से अधिक संविधान संशोधन करने पड़ेंगे। सविधान को लेकर जो हंगामा बीते लोकसभा चुनाव से हो रहा है उसका मुद्दा भी फिर उठ खड़ा होगा कि सरकार संविधान बदलना चाहती है। भले ही भाजपा जिसकी यह सोच 2014 से ही थी कि देश में एक चुनाव की व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन उसके द्वारा इस पर पहल करने में भी बहुत अधिक देर कर दी गई है यही कारण है कि अब कांग्रेस इसका यह कहकर विरोध कर रही है कि यह उसका एक राजनीतिक दांव है तथा वह जनता का ध्यान मुद्दो भटकाना चाहती है। जहां तक राजनीतिक दलों के समर्थन और विरोधों बात है तो इस मुद्दे पर भी वह दो खेमों में बंटे हुए हैं। एक तरफ विपक्ष के या यू कहें कि इंडिया गठबंधन के सहयोगी कुछ दल भी फैसले के साथ खड़े हैं। दरअसल मुद्दे चाहे जातीय जनगणना के हो या फिर वन नेशन एक इलेक्शन का यह अत्यंत ही उलझाऊ मुद्दे हैं, लेकिन सत्ता में बैठे लोग और विपक्ष के नेता आजकल ऐसे उलझाऊ मुद्दों के भरोसे अपनी राजनीति को आगे ले जाने में लगे हुए हैं। देश में वन नेशन वन इलैक्शन का प्रयास कितना सफल और असफल होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा। इसे लागू करने में व्यवहारिक दिक्कतों की बात तो बहुत बाद की बात है।



