आपदा का पहाड़

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हिमालयी क्षेत्रों में इस साल मानसूनी आपदा ने कहर बरपा रखा है। बीते तीन दशक में कभी मानसूनी आपदा का कहर नहीं देखा गया। उत्तराखंड और हिमाचल में इस मानसूनी काल में भारी जन धन की हानि हुई है। मौसम विज्ञानी और भूविज्ञानी भी इस बार पहाड़ पर टूटे आपदा के पहाड़ का कारण तलाश रहे हैं। उत्तराखंड और हिमाचल में इस मानसूनी आपदा के कारण लगभग 150 से अधिक लोग अपनी जान गवंा चुके हैं। सैकड़ों मकान जमींदोज हो चुके हैं लाखों—करोड़ का नुकसान हो चुका है। सडके और पुल ध्वस्त हो चुके हैं चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई है। आपदा की मार झेल रहे लोगों की मदद में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम में तो जुटी ही है सेना की भी मदद ली जा रही है। इस मानसूनी आपदा ने सामान्य जनजीवन को तो प्रभावित किया ही है इसके साथ ही अर्थव्यवस्था को भी चौपट कर दिया है। इस आपदा पर भले ही मानव का कोई नियंत्रण न सही लेकिन इस आपदा के प्रभाव को न्यूनतम रखने के प्रयास जारी हैं। इन राज्यों में जिस तरह से लगातार अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाएं हो रही है उससे नदियों और झीलों तथा बांधों में बेहिसाब पानी जैसे सब कुछ अपने साथ बहा ले जाने को तैयार है। पत्थर और मलबे में दबे लोगों की तलाश का काम मुश्किल हो गया है वहीं नदियों का उफान डरा रहा है और पहाड़ों में बने बांधों के लबालब होने से उनके टूटने का खतरा सर पर मंडरा रहा है। यह खतरा सिर्फ पहाड़ तक सीमित नहीं है पहाड़ों से आने वाली यह गंगा, यमुना, व्यास और मंदाकिनी नदियां मैदानों के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। सवाल यह है कि इस हालात के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है पहाड़ों पर बीते दो—तीन दशकों में जो अनियोजित विकास हुआ है उसे इसके लिए सबसे ज्यादा प्रमुख कारण माना जा रहा है। इस विकास पर भले ही हम कितने भी खुश क्यों न हो लेकिन सही मायने में इस विकास के पीछे ही हमने विनाश की एक ऐसी आधारशिला तैयार कर दी है जिसके नतीजे अब हमारे सामने आने शुरू हो गए हैं। पहाड़ों पर आज हम जो चौड़ी—चौड़ी और चिकनी सड़कें बनाने में जुटे हैं और पहाड़ों को गैर वैज्ञानिक ढंग से तोड़ने का काम कर रहे हैं उसने पहाड़ों के सीने को छलनी कर दिया है और वह इस तरह दरक रहे हैं जैसे रेत का ढेर हो। इन सड़कों के चौड़ीकरण में मलबे के निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं किए जाने और उसे नदियों में धकेले जाने से नदियों का मूल स्वरूप ही बदल गया है। इन बड़े निर्माण कार्याे के कारण पेड़ों का बेहिसाब कटान हुआ है जो भूस्खलन का सबसे अहम कारण है। नदियों के किनारे बसे शहर और बस्तियों ने नदी—नाले और खालो के प्रवाह क्षेत्र में कैसे अतिक्रमण किया गया, किसी से छिपा नहीं है। पहाड़ का कोई भी एक शहर ऐसा नहीं है जहां जल निकासी की कोई समुचित व्यवस्था हो बात चाहे शिमला की हो या फिर जोशीमठ और नैनीताल की हर जगह का हाल एक जैसा है। इन शहरों में कुछ दशक पहले तक सिर्फ एक दो मंजिल के टीन श्ौड वाले मकान हुआ करते थे और अब कंक्रीट की ऊंची ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। जिनके निर्माण के समय भूमि के भार वहन शक्ति तक का परीक्षण नहीं किया गया है। जिसका खामियाजा हम आज भोग रहे हैं और आगे आने वाले समय में हमारी भावी पीढ़ियों को भोगना पड़ेगा।

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