बुलडोजर कार्यवाही पर सवाल

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नूंह हिंसा का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया नूंह में शोभा यात्रा पर हमलों की आग ने गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल और अन्य कई क्षेत्रों को अपनी जद में ले लिया था इस घटना का सीधा सीधा मतलब सांप्रदायिक हिंसा से था। जिसकी शुरुआत शोभायात्रा पर हमले से एक संप्रदाय विशेष द्वारा एक सोची—समझी रणनीति के तहत की गई। दंगाइयों के खिलाफ जब शासन—प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की तो यह स्वाभाविक ही था कि उनके निशाने पर एक समुदाय विशेष के लोग ही रहने वाले थे। व्यापक स्तर पर धरपकड़ हुई पुलिस ने जिन लोगों को भी जेल भेजा उनके खिलाफ पुख्ता सबूत और सीसीटीवी के सबूत है। इसके बाद शासन स्तर पर इन अपराधियों के घर मकानों और दुकानों पर बुलडोजर की कार्यवाही शुरू की गई तो हड़कंप मच गया। और एक संप्रदाय विशेष के नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इसे एक समुदाय विशेष के खिलाफ एक तरफा कार्यवाही बताते हुए इस पर रोक लगाने की मांग की गई। अपील में एक ही समुदाय के 6 सौ से अधिक घरों को तोड़ने व गुरुग्राम में मस्जिदों को बंद करने का जिक्र भी किया गया है जिसे अदालत ने भी एक ही संप्रदाय विशेष के खिलाफ होने वाली कार्यवाही माना है और इस पर रोक लगा दी गई है। सवाल है यह है कि बीते कुछ सालों में कुछ राज्यों की सरकारों द्वारा तुरंत न्याय के नाम पर कानून और न्यायालयों से आगे बढ़कर इस बुलडोजर संस्कृति को जिस तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है वह क्या संवैधानिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित है। कई लोग हैं जो यह मानते हैं कि जो जैसा करे उसे उसके लिए वैसी ही सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन जब हम कानून के शासन की बात करते हैं तो क्या शासन—प्रशासन को कानून को अपने हाथों में लेना चाहिए। यह सुनिश्चित करना अदालतों का काम है किसी व्यक्ति ने वह अपराध किया भी है या नहीं जिसके आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया है या फिर किसी आरोपी पर अपराध सिद्ध होने से पहले ही उसके घर मकान और दुकानों पर बुलडोजर चला दिया जाना चाहिए? मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब पर कई सालों तक मुकदमा चला और अदालत ने जब उसे दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई तभी उसे फांसी पर लटकाया गया था जिसके पीछे एक ही कारण था कि अदालती प्रक्रिया का पूरा पालन करना और देश में कानून का राज होना। कानपुर के बिकरू गांव में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के मामले में भी हमने देखा था कि शासन—प्रशासन द्वारा उसके घर को बुलडोजर चलाकर तहस—नहस कर दिया गया था। गिरफ्तारी के बाद विकास दुबे ने पुलिस कस्टडी से भागने का प्रयास किया और पुलिस ने उसे ढेर कर दिया इस मामले को लेकर कई सवाल उठे थे। फैसला ऑन द स्पॉट और बुलडोजर कि यह संस्कृति बीते कुछ सालों में चर्चाओं के केंद्र में जरूर रही है जिसने यूपी के सीएम योगी को बुल्डोेजर बाबा के नाम से मशहूर कर दिया है। लेकिन व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने का यह तरीका न तो संवैधानिक है और न ही लोकतांत्रिक कहा जा सकता है। तुष्टीकरण की राजनीति के लिए की जाने वाली इस तरह की कार्रवाइयों के दूरगामी परिणाम कभी भी उचित या अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं। आज देश में जिस तरह के तनाव और उन्माद का माहौल तैयार किया जा रहा है वह आग से खेलने जैसा ही है। अच्छा हो कि कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना अपना काम करें।

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