पानी—पानी होते शहर

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मानसूनी सीजन में हर साल देश के अधिकांश शहरों को जलभराव की गंभीर समस्या से जूझना पड़ता है। हालात कई बार इतने अधिक गंभीर हो जाते हैं कि इन शहरों की सड़कों पर वाहनों की जगह नावों को चलते हुए हम सभी अपने बचपन से देखते आ रहे हैं। अभी हाल ही में हमने देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर नावों को चलते देखा था। उत्तराखंड और हिमाचल के भी कई शहरों में हमने सड़कों पर सैलाब और घरों में कमर तक घुसे पानी की तस्वीरें देखी। देश के इन शहरों की बरसात में बदहाली को देखकर किसी को भी शहरी जीवन से वितृष्णा हो सकती है। कृषि प्रधान भारत की 90 फीसदी जनता कभी गावों में रहती थी लेकिन बीते तीन—चार दशकों में लोगों में शहरों की ओर भागने की जो प्रवृत्ति बनी उसके कारण अब गांवों में 60 फीसदी लोग ही रह गए हैं देश में कुल मिलाकर आठ हजार के करीब नगर निकाय हैं जिनमें से अधिकाश्ंा छोटे व मझोले शहर तथा कस्बे है जबकि 300 के करीब बड़े दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहर है लेकिन इन तमाम शहरों को हर साल बारिश के सीजन में पानी पानी होते हुए हम देखते हैं। खास बात यह है कि इन शहरों में न तो कोई ड्रेनेज सिस्टम सुचारू है और न सीवर सिस्टम। जलभराव और इस पानी में तैरती गंदगी के बीच लोग जीते कैसे हैं? कई बार तो यह सोच कर किसी को भी हैरानी हो सकती है लेकिन देश के शहरों की हकीकत यही है। बारिश और जलभराव के कारण कूड़े का उठान निस्तारण भी खत्म हो जाता है फिर अगर हैजा, मलेरिया और डेंगू जैसे संक्रामक रोगों से लोग मरते हो तो मरे। बात दिल्ली की हो या फिर रुड़की और देहरादून की, सवाल यह है कि आखिर इस समस्या का कारण क्या है? और दूसरा सवाल यह है कि इस समस्या का आज तक कोई स्थाई समाधान क्यों नहीं हो सका। तो इसके जवाब में पहला सच यह है कि देश के छोटे से लेकर बड़े तक सभी शहर अनियोजित ढंग से विकसित हुए हैं। पहले नगर बसे या बसाये गए इसके बाद उनके विकास और जन सुविधाओं के बारे में सोचा गया। देश के इन शहरों में कोई नगर नियोजक नहीं होता है। जिसके जहां मन में आया बस गया और जिसके जहां मन में आया उसने बस्तियां बसा दी। बात उत्तराखंड की ही की जाए तो यहां 1000 से भी अधिक अवैध बस्तियां बसी है जो हर शहर में हैं जिन्हें मलिन बस्तियां कहा जाता है। मलिन बस्तियों की समस्या हर शहर की एक ऐसी पहेली है जिसे आज तक भी न कोई सुलझा सका है न कोई सुलझा सकता है। दूसरा अहम कारण है बजट की कमी और बजट का दुरुपयोग। सीवर सिस्टम व ड्रेनेज सिस्टम अथवा सड़क और नालियों को दुरुस्त रखने के लिए अव्वल तो पर्याप्त बजट नहीं होता है और जो होता भी है उसका दुरुपयोग रोका नहीं जा सकता। ऐसे हालात में इन शहरों को पानी—पानी होने से भला कोई कैसे बचा सकता है? एक अन्य कारण विभागों के बीच सामंजस्य का अभाव भी है। जिसके कारण हर शहर की सड़के नालिया हर साल में कई बार खोदी जाती हैं इसलिए यह देश के शहर कभी इस समस्या से निजात नहीं पा पाते।

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