कड़े मुकाबले को तैयार होता इंडिया

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भाषा श्ौली और भाव के दांव से अपने विरोधियों को चारों खाने चित करना है तो इस कला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता है उनकी इस अद्भुत कला ने ही उन्हें ब्रांड मोदी बनाया है। जिसका मुकाबला करने की कोई कुव्वत किसी में भी नजर नहीं आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतीक वादी राजनीति के ऐसे पुरोधा बन चुके हैं जिनकी काट करने के लिए अब देश का पूरा विपक्ष एकजुट होने का प्रयास कर रहा है। यह पहला मर्तबा है जब विपक्षी एकता में जुटे रणनीतिकार (इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव एलाइंस) इंडिया जैसे प्रतीकात्मक शब्द की खोज कर पाए हैं जिसने अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकारों को इसकी काट ढूंढने के काम में लगा दिया है। आने वाले दिनों में अब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी व पश्चिमी बंगाल से लेकर कर्नाटक तक जीतेगा इंडिया की गूंज सुनाई देने वाली है। विपक्षी एलाइंस के इस इंडिया नाम को लेकर भाजपा में इस कदर खलबली मची हुई है कि उनके अनुषांगिक दल और समर्थक इस पर अदालतों में आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी यह कह रहे हैं कि विपक्षी दल लोगों को इंडियन और इंडिया जैसे शब्दों से नहीं भटका सकता है। वह ईस्ट इंडिया और इंडियन मुजाहिदीन जैसे शब्दों का उदाहरण पेश कर अब यह कहने पर विवश है कि केवल देश का नाम इस्तेमाल करने से कुछ नहीं होने वाला है दिशाहीन विपक्ष भ्रष्ट नेताओं का समूह है। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी को इस प्रतीकात्मक राजनीति के एक शब्द इंडिया ने इतना बेचैन क्यों कर दिया है कि वह इस शब्द की परिभाषा लोगों को समझाने पर विवश हो गए हैं। इंडिया में एक शब्द इंक्लूसिव भी है जिसे काउंटर करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा कोई शब्द नहीं तलाश कर पा रही हैं। भाजपा जिसकी समूची राजनीति बीते एक दशक में बहुसंख्यक वादी निरंकुशता पर आकर टिक चुकी है ऐसी स्थिति में एक समावेशी शब्द उन लोगों के लिए बहुत कुछ मायने रखता है जिन्हें हाशिए से बाहर धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। भले ही प्रधानमंत्री मोदी और टीम चौकीदार चोर है जैसे प्रतीकात्मक राजनीतिक शब्दों पर कांग्रेस को मात दे चुके हो और मोदी सरनेम को लेकर राहुल गांधी को राजनीति के हाशिए से बाहर धकेलने के करीब पहुंच चुकी हो लेकिन अब भाजपा नेताओं को भी इस बात पर विचार मंथन करना होगा कि देश की राजनीति केवल अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारों और काला धन वापस लाने वाले हैं व हर गरीब को लखपति बनाने वाले हैं जैसे जुमलो से भी नहीं चलने वाली है। इंडिया जीतेगा या नहीं जीतेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन एक बात सत्य है कि विपक्ष ने अपने नए एलाइंस को इंडिया का नाम देकर भाजपा और एनडीए में बेचैनी जरूर पैदा कर दी है। 2024 में होने वाला आम चुनाव 1989 में होने वाले आम चुनाव से कम दिलचस्प नहीं होगा। इंडिया की एक के बाद एक सफलता पूर्व संपन्न होने वाली बैठकों से भाजपा का यह मुगालता भी अब टूटता जा रहा है कि विपक्ष एकजुट हो ही नहीं सकता। एनडीए व इंडिया के बीच होने वाले इस रोमांचक मुकाबले और परिणाम का इंतजार कीजिए।

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