जल प्रलय बड़ी व अंतहीन समस्या

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इन दिनों देश के कई राज्य मानसून की भीषण आपदा की मार झेल रहे हैं। उत्तराखंड, हिमाचल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और आधे उत्तर प्रदेश में जल प्रलय के हालात बने हुए हैं। मैदानी क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं तथा खेती किसानी को भारी नुकसान हुआ है वही पर्वतीय राज्यों में सबसे बड़ा नुकसान सड़कों और पुलों को हुआ है। जिसके कारण बिजली—पानी और खाघान्न आपूर्ति पूरी तरह से प्रभावित हुई है देश की राजधानी से लेकर आधा दर्जन से अधिक राज्यों में इस बारिश के कारण जो जान माल का नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई करना तो दूर की बात है उसका सही आकलन भी अभी संभव नहीं है। वायु—रेल और सड़क यातायात सब कुछ ठप हो गया है स्कूल कॉलेज भी बंद है। भारी बारिश के कारण फिलहाल सब कुछ तहस—नहस होता दिख रहा है। मौसम चक्र का बदलना और मानसून का आना—जाना हर साल होता है। लेकिन इस आपदा से बचने के समय रहते वैसे प्रयास नहीं किए जाते हैं जैसे की जरूरत है। न तो देश में आजादी के 75 सालों में कोई ऐसा ढांचा तैयार किया जा सका है जो सूखे की स्थिति में जब बारिश अत्यधिक कम होती है सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जल पहुंचाया जा सके और न कोई ऐसा सिस्टम तैयार किया गया है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र की नदियों को दूसरी नदियों से जोड़कर बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों की समस्याओं को हल किया जा सके। देश में नदियों का जाल जरूर बिछा है लेकिन इन नदियों के जल प्रबंधन की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण या तो जल बहकर समुद्र में चला जाता है और सूखाग्रस्त क्षेत्र प्यासे रह जाते हैं या फिर यह जल अतिवृष्टि के रूप में घर, मकान, दुकान और फसलों को चौपट कर देता है। हर साल हम प्रधानमंत्री से लेकर तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बाढ़ और सूखा ग्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करते देखते आ रहे हैं ऐसा लगता है कि देश के नेता अब एक सिर्फ हवाई सर्वे से सारी समस्याओं का समाधान कर डालेंगे। लेकिन यह हमारे नेताओ के लिए सिर्फ पिकनिक भर होता है अगर हवाई सर्वे समस्या का समाधान होता तो निश्चित ही देश इस समस्या से निजात पा चुका होता। नदियों को जोड़ने की कवायद दशकों से जारी है लेकिन आज तक इस पर कोई काम नहीं हुआ है। बीते कई दिनों से टीवी चैनलों पर समाचार आ रहा है कि दिल्ली डूबने वाली है लेकिन यह समाचार हर साल आता है और बारिश थमते ही स्वत समाप्त हो जाता है। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर दून तक देश का कोई भी एक शहर ऐसा नहीं है जहां पर हर साल जलभराव की समस्या सामने न आती हो लेकिन इस सवाल का जवाब शायद किसी ने भी ढूंढने की कोशिश नहीं की कि शहर का ड्रेनेज सिस्टम कैसे ठीक हो सकता है। सरकार ने देश भर में स्मार्ट सिटी का शगुफा तो छोड़ दिया लेकिन जिन शहरों को स्मार्ट सिटी की सूची में रखा गया है उन शहरों के हालात वास्तव में क्या है? और धरातल पर वह कितने स्मार्ट सिटी बन सके हैं यह जानने की जरूरत किसी ने नहीं समझी है। देहरादून इसका एक उदाहरण है जो बीते 5 सालों में स्मार्ट सिटी की जगह एक ऐसा बदहाल सिटी बन चुका है कि यहां रहने वालों ने कभी इस शहर की ऐसी बदहाल स्थिति नहीं देखी होगी सरकारों को जल प्रबंधन की नीतियों पर गौर करने की जरूरत है प्रकृति के साथ दशकों से की जा रही अनावश्यक छेड़छाड़ इस समस्या का मूल कारण है जिसका खामियाजा आज हम भोग रहे हैं।

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