लिव इन एक सामाजिक बीमारी

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भारत की सामाजिक संरचना की मूल इकाई परिवार और वह रिश्ते हैं जो हर व्यक्ति को समाज और संवेदनाओं से जोड़े रखते हैं। बीते कुछ दशकों में इस भारतीय सामाजिक व्यवस्था को छिन्न—भिन्न करने वाले अनेक तथ्य सामने आए हैं जिनमें से लिव इन भी है। बीते कल उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में समान नागरिक संहिता के लिए बनाई गई हाई पावर ड्राफ्ट कमेटी जब रायशुमारी कर रही थी तो उसमें लिव इन की पैरवी बड़े जोरदार तरीके से की गई। कई लोगों द्वारा इसे कानूनी मान्यता दिए जाने की बात भी कही गई। इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि लिव इन हमारे भारतीय समाज और संस्कृति का हिस्सा नहीं है यह पश्चिमी देशों की एक ऐसी बीमारी है या कोढ़ है जो सामाजिक व्यवस्थाओं का बहिष्कार करता है और किसी रिश्ते में विश्वास नहीं करता। दरअसल बीते कुछ सालों में देश की युवा पीढ़ी जिसे अपनी सनातन संस्कृति और समाज के शास्त्र के बारे में कोई जानकारी नहीं है तथा जिसकी नजरों में जिंदगी सिर्फ खाओ पियो और ऐश करो के अर्थों तक ही सिमटी हुई है उन युवाओं को कोई सामाजिक और पारिवारिक बंधन अथवा जिम्मेदारी और कर्तव्यों का बोझ नहीं चाहिए, के सिर चढ़ा एक भूत है लिव इन। बिना शादी किए या रिश्तो में बंधे अगर कोई स्त्री पुरुष साथ रहते हैं सेक्स इंजॉय करते हैं और बच्चे भी पैदा करते हैं और फिर जब चाहे तब अलग हो सकते हैं ऐसे में क्या किसी भी स्त्री—पुरुष या उनसे पैदा होने वाले बच्चों के संवैधानिक और पारिवारिक अधिकारों की सुरक्षा संभव है? जिन बच्चों के पास अपने बाप या मां का नाम तक नहीं होगा क्या वह अपने जन्मदाताओं के प्रति किसी कर्तव्य बोध से बंधे हो सकते हैं? दरअसल लिव इन की इस बीमारी की जड़ में युवा पीढ़ी की वह सोच है जिसे वह आजादी का नाम देते हैं। कर्तव्यों से आजादी, पारिवारिक सामाजिक रिश्तो और व्यवस्था से आजादी। युवाओं की उन्मुक्त जीवन (बंधन मुक्त) की चाह ने ही उन्हें लिव इन की ओर खींचा है। इन युवाओं को एक ऐसी जिंदगी की तलाश है जहां वह कुछ भी करें उन्हें रोकने टोकने वाला कोई न हो और न उनके किए को अच्छा या बुरा बताने वाला। निश्चित तौर पर यह व्यवस्था भारतीय समाज को ग्राहय नहीं हो सकती है यह वास्तव में जंगली व्यवस्था है। बीते लंबे समय से देश में समलैंगिक रिश्तो को कानूनी जामा पहनाने की लड़ाई लड़ी जा रही है जो एक ऐसी ही सामाजिक अपभ्रमता की लड़ाई है। सवाल यह है कि आज आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी सनातनी संस्कृति और सभ्यता को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं। आज देश के समाज के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है वह पारिवारिक रिश्तो में बढ़ती असंवेदनशीलता है, रिश्तो में जो दरकन आ रही है वह समाज को संवेदनहीनता की ओर ले जा रही है बच्चों का संरक्षण समाप्त हो रहा है तो वृद्धों को वृद्धावस्था का सहारा समाप्त हो रहा है। भारतीय समाज के लिए निश्चित ही यह अवस्था ठीक नहीं कही जा सकती है। मानवीय जीवन में संवेदनाओं का अगर संचार नहीं है तो ऐसा समाज किसी काम का नहीं हो सकता।

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