- शहरों की नींव में दफन हो रहे हैं पहाड़ के गांवों के पुश्तैनी आंगन
- रोजगार की तलाश में शहर गए बेटे, गांव में अकेले रह गए मां-बाप
- बुजुर्ग आंखें आज भी हर बस और हर कदम में तलाशती हैं अपनों को
- आज के दौर में वीडियो काल को बना दिया है डिजिटल आत्मीयता
देहरादून। पहाड़ की ऊंची चोटियों पर जब कोहरा उतरता है, तो पहाड़ के किसी दूरस्थ गांव की एक धुंधली सी खिड़की में एक बूढ़ा चेहरा टकटकी लगाए नीचे सड़क की ओर देखता मिलता है। वह सड़क जो सालों पहले उनके बेटे को साहब बनाने के लिए शहर ले गई थी। आज सड़क तो चकाचक डामर वाली हो गई है, लेकिन उस पर चलने वाले कदम अब गांव की ओर कम और शहर की ओर ज्यादा बढ़ते हैं।
उत्तराखंड के हजारों गांवों की यही कहानी है। पलायन ने सिर्फ गांव खाली नहीं किए, उसने मां-बाप के जीवन से सहारा भी छीन लिया। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, आज वही हाथ बुढ़ापे में सहारे को तरस रहे हैं। कई बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनके बच्चे साल में सिर्फ एक-दो बार गांव आते हैं। पहाड़ में पलायन ने केवल गांव खाली नहीं किए, उसने बुढ़ापे का लाठी भी छीन ली है। आज उत्तराखंड के हजारों बुजुर्ग पहरेदार बनकर रह गए हैं। वह अपनी पुश्तैनी जमीन और खंडहर होते मकानों की रखवाली कर रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद किसी मोड़ पर उनका लाल वापस आएगा।
यह पहाड़ की आज की हकीकत है दो बूढ़े चेहरे एक-दूसरे को निहारते हुए रात काट लेते हैं। आज पहाड़ के गांवों में रिश्तों की डोर व्हाट्सएप वीडियो काल पर टिक गई है। रविवार के दिन जब नेटवर्क साथ देता है, तो शहर में बैठा बेटा चंद मिनटों के लिए अपने बच्चों को दादा-दादी का चेहरा दिखाता है। आज के दौर में बीमार मां या पिता को अस्पताल ले जाने के लिए अब बेटा नहीं, बल्कि गांव का कोई पड़ोसी या टैक्सी वाला सहारा बनता है।
आज गांवों तक सड़क पहुँची तो उम्मीद जागी थी कि दूरियां घटेंगी। लेकिन विडंबना देखिए इन्हीं सड़कों पर सवार होकर पहाड़ की जवानी मैदानों की ओर ऐसी उतरी कि फिर मुड़कर वापस नहीं आई। पीछे छूट गए वह बूढ़े मां-बाप जिन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर अपने बच्चों को इस काबिल बनाया कि वह शहर जा सकें। आज उन्हीं बच्चों के पास अपने उन माता-पिता के लिए वक्त नहीं है, जिन्होंने अपनी पूरी उम्र पहाड़ की पथरीली खेती और अभावों में काट दी।




