सड़े हुए सिस्टम की तस्वीर

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स्वास्थ्य सचिव की पत्नी और दून अस्पताल की वरिष्ठ एक महिला डॉक्टर के बीच जो विवाद का मामला सामने आया है वह हमारे सड़े हुए सिस्टम का एक ऐसा सच है जिससे सभी मुंह फेर रहे हैं। आजादी के 75 साल बाद भी हमारे अफसर और नेताओं से लेकर समूचा तंत्र गुलामियत की सोच से ऊपर नहीं उठ सका है। स्वास्थ्य सचिव पंकज पांडे की पत्नी को अपने ओपीडी मरीजों को छोड़कर उनके घर जाकर देखने का आदेश देने वाले दून प्रशासन के अधिकारी क्या इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं है? एक वरिष्ठ डॉक्टर से अभद्रता की जाती है और अस्पताल प्रशासन उल्टा उन्हें ही सचिव की पत्नी से माफी मांगने को कहता है। क्या यह अधिकारियों की गलती नहीं है? क्या डॉक्टर निधि के माफी मांगने से इन्कार करने पर उनका तुरंत तबादला करने वाले अधिकारी इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं है। सच यह है कि इस सड़े हुए सिस्टम में सबको सिर्फ अपनी हनक दिखाने से ही मतलब है। एक आईएएस जो सबके सर पर बैठा है सब उसके इशारों पर बंदर की तरह नाच रहे हैं और अगर कोई उनका सहकर्मी उत्पीड़न का शिकार हो रहा है तो उसे माफी मांगने की सलाह दे रहे हैं और उसे भी अपनी तरह बंदर बनकर अपने साथ नाचने को कह रहे हैं। अस्पताल प्रशासन का सचिव के घर जाकर उनकी पत्नी को मनाने के प्रयास करना क्या सिस्टम व्याप्त चाटुकारिता का हिस्सा नहीं है? क्या इनके लिए अफसरों के बीवी—बच्चे भी अफसर होते हैं जिनके चरणों में शीश नवाए बिना उनकी नौकरी नहीं चल सकती है? लेकिन सच यही है कि इस सड़े हुए सिस्टम का यही सच है और इससे भी बड़ा सच यह है कि सत्ता में बैठे लोग भी सिर्फ अपनी और अपनी सरकार की किरकिरी कराने से बचने के लिए वैसे ही कार्रवाई करते दिखते हैं जैसी इस मामले में की जा रही है कि तबादला रद्द कर दो और जांच बिठा दो। स्वाभाविक है कि जंाच चलने तक मामला ठंडा हो जाएगा। जब किसी को तबादले की जरूरत होती है तो महीनों और सालों अधिकारियों के सामने माथा टेकना पड़ता है लेकिन डॉ.निधि जैसे मामलों में पूरा महकमा चंद घंटों में उनका ट्रांसफर लेटर उन्हें थमा देता है। उनके ट्रांसफर का आदेश देने वाला कौन था और क्यों किया गया आदेश, यह सब कुछ साफ है। इसके लिए कोई एक व्यक्ति नहीं पूरा सिस्टम दोषी है। इसके लिए सही मायने में किसी जांच की जरूरत ही नहीं है और न निष्पक्ष जांच अपेक्षित है यह सिर्फ खानापूर्ति है। लेकिन सरकार में बैठे लोगों को इस सिस्टम को सुधारने के लिए दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। जिससे सुधार की प्रक्रिया को कम से कम एक कदम आगे तो बढ़ाया जा सके। स्थिति अगर यहां तक पहुंची है, नौकरशाह बेलगाम हो गए हैं तो इसके लिए भी सत्ता में बैठे लोग ही जिम्मेवार है।

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