नशा मुक्ति को मैराथन

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अगला दशक उत्तराखंड के विकास का दशक होगा। भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त किया जाएगा। बेरोजगारी को समाप्त किया जाएगा पलायन को रोका जाएगा। उत्तराखंड को नशा मुक्त बनाना है राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लाना है। राजस्व पुलिस व्यवस्था को हटाना है और स्मार्ट पुलिसिंग व्यवस्था को बनाना है, आदि—आदि और न जाने कितने लक्ष्य राज्य की दिशा और दशा को बदलने के लिए रखे गए हैं। वर्तमान भाजपा सरकार जो कुछ कह रही है और कर रही है उसमें ऐसा कुछ खास नहीं है जो पहली बार किया या कहा जा रहा हो। पूर्ववर्ती सरकारें भी अपने—अपने समय में ऐसे ही तमाम बातें करती रही है। उत्तराखंड को शहीदों के सपनों का राज्य बनाना है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस या ऊर्जा प्रदेश और पर्यटन प्रदेश बनाने जैसी बातें पहले भी होती रही है सवाल यह है कि दो दशकों में राज्य में क्या कुछ हुआ है। अभी जब यूकेएसएसएससी भर्ती घोटाले का सच सामने आया तो चारों तरफ से राज्य के लोगों की यही धिक्कार सुनाई पड़ी थी कि क्या इसी दिन के लिए उन्होंने उत्तराखंड राज्य की लड़ाई लड़ी थी। राज्य बने हुए भले ही दो दशक हो गए हों लेकिन राज्य में 200 से अधिक छोटे—बड़े घोटाले हो चुके हैं और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने की बातें करने वाले सूबे के नेता एक अदद लोकायुक्त का गठन नहीं कर सके हैं। बीते कल हमने नशा मुक्त प्रदेश के लिए सीएम धामी को मैराथन में दौड़ते हुए देखा। राज्य में नशे के खिलाफ यह पहली मैराथन दौड़ नहीं है जब से राज्य बना है तब से अब तक ऐसी कई मैराथन दौड़ हम लगा चुके हैं। लेकिन इन तमाम दौड़ों के नतीजे ढाक के तीन पात हैं। नशे का कारोबार राज्य गठन के बाद चार गुना अधिक हो चुका है। स्कूल, कॉलेज और छात्रावासों तक को इस नशे ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है। मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि नशा समाज के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। सवाल यह है कि इस अभिशाप को समाप्त करने के लिए अब तक की सरकारों द्वारा क्या किया गया है? अगर राजधानी देहरादून की बात करें तो जिले में 40 पंजीकृत नशा मुक्ति केंद्र हैं जबकि इससे भी ज्यादा नीम हकीमों की दुकानें हैं लेकिन यह नशा मुक्ति केंद्र भी नशा मुक्ति के लिए नहीं चल रहे हैं बल्कि नशा मुक्ति के नाम पर सिर्फ कारोबार कर रहे हैं। इन नशा मुक्ति केंद्रों में नशे के कारोबार से लेकर यौन शोषण व मारपीट और उत्पीड़न के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। जिससे तंग आकर लोग आत्महत्या तक कर रहे हैं तथा यहां से जान बचाकर भागने पर आमादा हैं। सही मायनों में यह नशा मुक्ति केंद्र नहीं यातना केंद्र हैं। जिन्हें देखने वाला कोई नहीं है और इन पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। नशा तस्करी का धंधा करने वालों को अगर पुलिस पकड़ भी लेती है तो वह चार दिन में फिर बाहर आ जाते हैं और धधें पर लग जाते हैं। सरकार को चाहिए कि वह इन सभी नशा मुक्ति केंद्रों को बंद कर सरकारी अस्पतालों में नशा मुक्ति वार्ड बनाएं तथा नशे के आदी लोगों का डॉक्टरों की देखरेख में इलाज हो सके वहीं नशा तस्करी पर सख्ती से रोक लगाई जाए। मैराथन दौड़ से प्रदेश को नशा मुक्त नहीं बनाया जा सकता है।

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