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वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी

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दुनिया की अर्थव्यवस्था अब केवल उत्पादन की क्षमता से नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी से भी शक्ति का निर्धारण करती है। जिस देश की वस्तुएं, सेवाएं, तकनीक और पूंजी दुनिया के बाजारों में जितनी अधिक पहुंच रखती हैं, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव उतना ही व्यापक होता है। यही कारण है कि आज अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक वर्चस्व की लड़ाई केवल शुल्क, आयात-निर्यात और बाजार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, तकनीक, ऊर्जा, खनिजों और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण की बड़ी प्रतिस्पर्धा है। इस बदलते परिदृश्य में भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था कब बनेगा। असली सवाल यह है कि जब वैश्विक व्यापार की तस्वीर बदलेगी, तब उसमें भारत की हिस्सेदारी कितनी होगी? भारत लंबे समय से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी, डिजिटल अर्थव्यवस्था और बढ़ती विनिर्माण क्षमता उसकी बड़ी ताकत हैं। लेकिन आर्थिक आकार और वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी दो अलग-अलग चीजें हैं। बड़ी अर्थव्यवस्था होना जरूरी है, पर दुनिया के बाजार में अपनी जगह बनाना उससे भी ज्यादा जरूरी है। चीन ने पिछले कुछ दशकों में इसी अंतर को समझा। उसने केवल अपने घरेलू बाजार पर भरोसा नहीं किया, बल्कि दुनिया का कारखाना बनने की रणनीति अपनाई। इलेक्ट्रानिक्स से लेकर मशीनरी, रसायन, सौर ऊर्जा उपकरण और उपभोक्ता वस्तुओं तक उसने वैश्विक बाजारों में अपनी मौजूदगी स्थापित की। परिणाम सामने हैकृविश्व व्यापार की आपूर्ति शृंखलाओं में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है। भारत के लिए चुनौती यहीं से शुरू होती है। भारत को यदि वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी है तो उसे केवल मेक इन इंडिया के नारे से आगे बढ़ना होगा। उत्पादन की लागत, गुणवत्ता, लाजिस्टिक्स, बंदरगाहों की क्षमता, बिजली की उपलब्धता, कर व्यवस्था, कुशल श्रम और नियामकीय सरलता इन सभी मोर्चों पर प्रतिस्पर्धी होना होगा। दुनिया अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है। यह भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता चाहती हैं। चीन प्लस वन जैसी रणनीतियां इसी बदलाव का संकेत हैं। लेकिन अवसर अपने आप निवेश में नहीं बदलता। उसके लिए भारत को विश्वसनीय विनिर्माण केंद्र साबित करना होगा। भारत की दूसरी बड़ी ताकत सेवा क्षेत्र है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, डिजिटल सेवाएं, परामर्श और पेशेवर सेवाओं में भारत ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। लेकिन आने वाले समय में केवल सेवाओं का निर्यात पर्याप्त नहीं होगा। भारत को वस्तु और सेवा दोनों क्षेत्रों में अपनी वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, औषधि, आटोमोबाइल, हरित ऊर्जा उपकरण, मशीनरी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में भारत के पास बड़ा अवसर है। यदि इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ा जाता है तो निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। लेकिन इसके लिए एक कठिन राजनीतिक और आर्थिक निर्णय भी जरूरी हैकृभारत को अपने बाजार और अपने उद्योग के बीच संतुलन साधना होगा। अत्यधिक संरक्षण से घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा से बच सकता है, लेकिन लंबे समय में वह वैश्विक स्तर पर कमजोर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, बिना तैयारी के विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए बाजार खोलना छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए संकट पैदा कर सकता है। इसलिए नीति का लक्ष्य संरक्षण नहीं, प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए। वैश्विक व्यापार का अगला चरण और भी जटिल होगा। व्यापार युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा संकट, तकनीकी प्रतिबंध और महत्वपूर्ण खनिजों की राजनीति विश्व व्यापार को प्रभावित करेंगे। ऐसे समय में किसी एक देश या एक बाजार पर निर्भरता जोखिमपूर्ण होगी। भारत को इसी कारण यूरोप, अमेरिका, पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों का विस्तार करना होगा। भारत जितने अधिक बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाएगा, वैश्विक झटकों के सामने उसकी अर्थव्यवस्था उतनी ही सुरक्षित होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी केवल केंद्र सरकार की नीति से नहीं बढ़ेगी। इसके लिए राज्यों को भी प्रतिस्पर्धी बनना होगा। जिस राज्य में जमीन, बिजली, परिवहन, कौशल, कानून-व्यवस्था और निवेश की प्रक्रिया बेहतर होगी, उत्पादन वहीं जाएगा। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए भी इसका अलग अर्थ है। यहां बड़े पैमाने का पारंपरिक विनिर्माण संभव नहीं तो औषधीय पौधों, जैविक कृषि, स्थानीय उत्पादों, पर्यटन, आईटी-सक्षम सेवाओं और हिमालयी उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की रणनीति बनानी होगी। भारत की महत्वाकांक्षा यदि केवल जीडीपी के आकार तक सीमित रही तो वह अधूरी होगी। आर्थिक शक्ति का वास्तविक पैमाना यह होगा कि भारत दुनिया को क्या बेचता है, कितनी मात्रा में बेचता है और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में उसका स्थान कितना महत्वपूर्ण है। आज दुनिया बदल रही है। अमेरिका अपने उद्योग को वापस मजबूत करना चाहता है, चीन वैश्विक बाजारों में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है और यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ा रहा है। इस पुनर्संरचना के बीच भारत के पास एक दुर्लभ अवसर है। लेकिन अवसर और उपलब्धि के बीच नीति, क्रियान्वयन और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता की खाई है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बने रहने से आगे बढ़कर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ताओं में शामिल होना होगा। वैश्विक व्यापार की मेज पर केवल खरीदार की कुर्सी पर्याप्त नहीं है और भारत को निर्णायक हिस्सेदार बनना होगा।

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