September 5, 2026आज शिक्षक दिवस है। स्कूलों में समारोह होंगे, शिक्षकों को सम्मान मिलेगा, सोशल मीडिया पर गुरु की महिमा के संदेश छाए रहेंगे। मंचों से शिक्षक को राष्ट्र निर्माता बताया जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन शिक्षक दिवस के इस शोर के बीच एक सवाल भी पूछा जाना चाहिए जिस शिक्षक के कंधों पर देश का भविष्य रखा है, क्या व्यवस्था ने उसके कंधों का बोझ कम किया है? पहाड़ के दूरस्थ गांवों में विद्यालय आज भी केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि गांव के अस्तित्व की निशानी हैं। जहां पलायन ने घरों के दरवाजे बंद कर दिए, वहां स्कूल की घंटी गांव में जीवन की आखिरी आवाज बनकर रह गई है। लेकिन जब स्कूल में शिक्षक ही पर्याप्त नहीं होंगे, जब बच्चों की संख्या लगातार घटती जाएगी और जब शिक्षक को पढ़ाने से ज्यादा कागजी और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों में उलझा दिया जाएगा, तब शिक्षा का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा? विडंबना देखिए। हम शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहते हैं और उसी शिक्षक को कभी जनगणना, कभी चुनाव, कभी सर्वे, कभी ऑनलाइन आंकड़ों और कभी दूसरे प्रशासनिक कामों में लगा देते हैं। सवाल यह नहीं कि ये काम जरूरी हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या हर जरूरी काम शिक्षक से ही कराया जाना जरूरी है? शिक्षक का मूल काम बच्चों को पढ़ाना है। उसे वही करने दिया जाना चाहिए। उत्तराखंड की शिक्षा समस्या को केवल स्कूल भवन, स्मार्ट क्लास और डिजिटल बोर्ड के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यहां शिक्षा का सवाल सीधे पलायन और गांवों के भविष्य से जुड़ा है, जिस गांव में अच्छा स्कूल नहीं होगा, वहां परिवार बच्चों के भविष्य के लिए शहर की ओर जाएंगे। बच्चे जाएंगे तो गांव खाली होगा। गांव खाली होगा तो खेत, संस्कृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी कमजोर होगी। इसलिए पहाड़ के विद्यालयों में शिक्षक की नियुक्ति महज सरकारी पद भरना नहीं है। यह गांव को बचाने की नीति है। दुर्गम क्षेत्रों में तैनात शिक्षक को सुविधाएं, आवास, बेहतर संसाधन और सम्मानजनक कार्य वातावरण देना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। पहाड़ में शिक्षक को भेज देना पर्याप्त नहीं, उसे वहां टिके रहने लायक व्यवस्था देना भी उतना ही जरूरी है। शिक्षक दिवस पर गुलदस्ता देने में कोई बुराई नहीं, लेकिन असली सम्मान तब होगा जब शिक्षक से कहा जाएकृआप पढ़ाइए, बाकी व्यवस्था हम संभालेंगे। आज तकनीक तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर डिजिटल शिक्षा तक सब कुछ कक्षा में प्रवेश कर रहा है। लेकिन मशीन जानकारी दे सकती है, शिक्षक विवेक पैदा करता है। इंटरनेट उत्तर दे सकता है, शिक्षक सवाल करना सिखाता है। इसलिए शिक्षा का भविष्य तकनीक और शिक्षक के संघर्ष में नहीं, दोनों के सहयोग में है। शिक्षक दिवस का अवसर हमें यह याद दिलाने आया है कि कक्षा मजबूत होगी तो समाज मजबूत होगा और कक्षा तभी मजबूत होगी जब शिक्षक को कर्मचारी नहीं, शिक्षा व्यवस्था की केंद्रीय शक्ति माना जाएगा। आज शिक्षक को सम्मानित करते समय एक संकल्प भी होना चाहिए, गुलदस्ते कम, सुविधाएं ज्यादा, भाषण कम, संसाधन ज्यादा, आदेश कम, भरोसा ज्यादा। क्योंकि उत्तराखंड का भविष्य केवल सचिवालय में बनने वाली नीतियों से तय नहीं होगा। उसका भविष्य उन पहाड़ी स्कूलों की कक्षाओं में तय होगा, जहां कोई शिक्षक आज भी सीमित साधनों के बीच बच्चों को बेहतर कल का सपना देखना सिखा रहा है। उस शिक्षक को सलाम तभी सार्थक होगा, जब व्यवस्था उसके साथ खड़ी दिखाई दे।