Home उत्तराखंड देहरादून बुरे दिन आने वाले हैं?

बुरे दिन आने वाले हैं?

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इजराइल रुकेगा नहीं और ईरान झुकेगा नहीं? अमेरिका किसी की सुनेगा नहीं? बीते 21—22 दिनों से जारी जंग ने अब सिर्फ मिडल ईस्ट के देशों को ही नहीं बल्कि समूची दुनिया को ऐसे गंभीर संकट में लाकर खड़ा कर दिया है जिसे तीसरे विश्व युद्ध का नाम दिया जाना गलत नहीं होगा। जिस मिडिल देशों में यह युद्ध की आग धधक रही है उससे सिर्फ इजरायल, ईरान और व अमेरिका ही प्रभावित नहीं हो रहा है भारत सहित सभी विश्व देश गंभीर संकट में फंस चुके हैं। अर्थशास्त्रियों द्वारा अब एक और वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका जताई जा रही है तथा विश्व में भुखमरी का शिकार 32 करोड लोगों की संख्या में 4.5 करोड़ लोगों की संख्या और जुड़ने की बात कही जा रही है। जिस क्षेत्र में इन दिनों मिसाइलें आग बरसा रही है वह दुनिया भर के देशों के लिए एनर्जी सप्लाई का प्रमुख केंद्र है। बात चाहे तेल की हो या फिर गैस की अथवा उर्वरकों की, 70 फीसदी से अधिक की डिलीवरी इनके जरिए ही होती है। इस सप्लाई की चेन के टूटने का क्या परिणाम होगा इसे लेकर अब चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है। अमेरिका जैसे देश में अब रसोई गैस के लिए त्राहि—माम की स्थिति पैदा हो चुकी है और लोग ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। अमेरिका को इस युद्ध पर सिर्फ भारी भरकम खर्च ही नहीं उठाना पड़ रहा है उसके व्यापार और आम जिंदगी पर भी असर पड़ना शुरू हो गया है। मिडिल ईस्ट की इस जंग में जिस तरह से गल्फ कंट्री के तेल संसाधनों को निशाना बनाया जा रहा है उससें इन देशों की अर्थव्यवस्था को उबरने में कई सालों का समय तो लग ही जाएगा इसके साथ ही भारी जान माल का जो नुकसान हो रहा है उसकी क्षतिपूर्ति भी आसान नहीं होगी। अमेरिका और भारत जैसे देश जो पहले से ही इतने कर्ज के बोझ में दबे हुए हैं उनके लिए तो हालात और मुश्किल भरे होने वाले हैं। इस समय अमेरिका के ऊपर 700 लाख करोड़ का कर्ज है तथा भारत पर 225 लाख करोड़, जो इन देशों की जीडीपी से भी कहीं अधिक है। भारत की भले ही इस युद्ध में कोई भूमिका न हो लेकिन उसका 20 लाख करोड़ का नुकसान होने की बात कही जा रही है। इस युद्ध के कारण भारतीय शेयर बाजार में अब तक सात फीसदी से अधिक की जो गिरावट आई उसने करोड़ों लोगों को कंगाल कर दिया है। गुजरात के सूरत से आई एक खबर के अनुसार यहां उघोगों में काम करने वाले मजदूर अब नौकरी छोड़कर अपने गांव भागने पर मजबूर हैं। क्योंकि गैस की किल्लत के कारण न तो वह अपने घर में खाना पका पा रहे हैं और न बाहर उन्हें खाना मिल पा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया अपना मूल्य खोता जा रहा है और अब एक डालर के मुकाबले रुपये की कीमत 93.17 तक पहुंच चुकी है। जिससे भारत का आयात का खर्च भी लगातार बढ़ता जा रहा है। जिन चीन जैसे देशों ने इस युद्ध की आशंका के मद्देनजर पहले ही तीन—चार माह का तेल—गैस भंडारण कर लिया गया था वह भले ही इस संकटकाल को आसानी से झेल ले, लेकिन भारत के लिए आने वाले समय में इसका सामना करना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाएगा। मूडी द्वारा दी गई चेतावनी में कहा गया है कि अगर हालात यही रहे तो आने वाले 49 दिनों में पूरा विश्व आर्थिक मंदी के शिखर पर खड़ा हो जाएगा भारत जिसमें डिग्रीधारी 61 फीसदी युवा पहले से ही मौजूद है उस देश का क्या होगा? अगर पेट्रोल 200 रूपये लीटर और गैस सिलेंडर 1500 रूपये में भी नहीं मिल सकेगा तथा खेतों के लिए यूरिया होगा ही नहीं।

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