उत्तराखंड राज्य गठन को 25 साल का समय बीत चुका है। इस राज्य के पहाड़ वासियों की मनः इच्छा भले ही राज्य गठन से यह रही हो कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ में ही हो लेकिन राज्य के नेता और अधिकारियों से अगर उनकी अंतरात्मा की बात पूछी जाए तो उन्होंने कभी भी मन से यह चाहा ही नहीं है कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ में ही होनी चाहिए। राज्य गठन के एक दशक तक उनके द्वारा इस मुद्दे की तरफ कभी आम आदमी का ध्यान जाने ही नहीं दिया गया इसके बाद आधा दशक का समय सिर्फ राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान का चयन करने की आड़ में गुजार दिया। आयोग बने प्रयोग भी हुए तथा जनता ने आवाज भी उठाई लेकिन नतीजा शून्य ही रहा और जब नेताओं को लगने लगा की राजधानी गैरसरण के मुद्दे पर कुछ लोगों की जन अपेक्षाएं उस हद तक जुड़ी है तो वह सरकार बनाने में सहायक हो सकती है। नेताओं ने भराड़ीसैंण में भूमि के चयन के साथ विधान भवन के भूमि पूजन की प्रक्रिया से लेकर यहां सत्र के आयोजनों का आडंबर भी शुरू कर दिया गया। जो अभी तक निरंतर जारी है हम इसे आडंबर इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भराड़ीसैंण में टेंट लगाकर विधानसभा का पहला सत्र आहूत किए जाने से लेकर अब तक कोई एक भी सत्र तय समय अवधि तक नहीं चलाया जा सका है। भले ही इस बीच भाजपा ने भराड़ीसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया गया हो अथवा कांग्रेस ने अपने समय में नियमित रूप से बजट सत्र का आयोजन यहां कराने का प्रस्ताव पारित कराया हो लेकिन इस हकीकत को हम सभी जानते हैं कि दो—चार दिन का यहां सत्र आयोजित कराना सरकार और नेताओं को ही नहीं अपितु राज्य के अधिकारियों को भी किसी सजा से कम नहीं लगता है वह पूरी तैयारी के साथ देहरादून से ऐसे रवाना होते हैं जैसे कहीं पिकनिक पर जा रहे हो। तथा अपनी हाजिरी लगाकर या तो सत्र के समापन से पूर्व ही भाग आते हैं या फिर बिजनेस न होने की आड़ में चार दिन का सत्र दो या तीन दिन में ही समाप्त हो जाता है। सरकार को इस साल भी बजट सत्र यहां आयोजित कराना है। मगर सत्र से पूर्व ही भाजपा विधायक मनोज रावत ने भराड़ीसैंण सत्र और राजधानी के चयन पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं उनका कहना है कि स्थान का चयन ही गलत है यहां बहुत सर्दी होती है, बर्फबारी होती है, ऑक्सीजन की भी कमी है उनकी इस बयान बाजी पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि अगर दिक्कतें हैं तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी सरकार की है सरकार असमर्थ है,कांग्रेस इन दिक्कतों को दूर कर सकती है। विपक्ष के साथ—साथ अब भाजपा के विधायक भी भराड़ीसैंण के चयन को गलत बता रहे हैं वहीं दूसरी ओर सचिवालय संघ के द्वारा भी शासन को पत्र लिखकर मांग की गई है कि यहां कर्मचारियों को रहने खाने तक की भारी दिक्कतें होती है इसलिए कम से कम कर्मचारी सत्र के समय यहां भेजे जाए। इस तरह की जो मनः स्थिति नेताओं व अधिकारियों की है तो वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भराड़ीसैण राजधानी हो यह कोई भी नहीं चाहता और पहाड़ की राजधानी पहाड़ में हो यह सिर्फ कहने भर की बात है।




