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मीडिया पर रोक लगाना क्या सही फैसला?

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उत्तराखण्ड के कोटद्वार में इन दिनों जो विवाद छाया हुआ है वह इन दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से चर्चाओं में है। हालांकि अब इन सब मामलों में प्रशासन भी पूरी तरह से घिर चुका है। लोगों का मानना है कि इस मामले के तूल पकड़ने के पीछे सिर्फ पुलिस प्रशासन ही जिम्मेदार है। क्योंिक जब एक दल विशेष के लोगों द्वारा एक अल्पसंख्यक की दुकान पर जाकर उसको दुकान का नाम बदलने पर दबाव डाल रहे थे और जिसका विरोध एक व्यक्ति द्वारा किया गया तो पुलिस प्रशासन द्वारा उस व्यक्ति के खिलाफ ही मुकदमा दायर कर दिया गया और जब इस मामले में सोशल मीडिया में लोगों द्वारा विरोध जताया गया तो अब पुलिस प्रशासन द्वारा पौड़ी जिले के कोटद्वार में मीडिया के घुसने पर ही रोक लगा दी गयी है। क्या यह पुलिस प्रशासन द्वारा सही फैसला किया गया है? यह सोचनीय विषय है। कल तक लोगों का यह मानना था कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया शासन—प्रशासन के हाथों में बिक चुका है लेकिन अब अगर मीडिया सच्चाई दिखाना चाहता है तो उसे शासन—प्रशासन द्वारा रोका जा रहा है। क्या यह सही है? हालांकि मामले को लेकर सुर्खियों मे आया युवक दीपक का कहना है कि वह सिर्फ सच्चाई के साथ खड़ा था बाकी उसकी किसी भी मामले में कोई राजनीतिक मश्ंाा नही है। जबकि इस मामले को लेकर कई राजनीतिक दलो द्वारा भी अपनी राजनीति की रोटिंया सेकी जानी शुरू हो चुकी है। बीते दिनों जब एक मीडिया कर्मी द्वारा दिल्ली से आकर कोटद्वार में पुलिस के एक आलाधिकारी से मामले को लेकर बातचीत की गयी तो वह अधिकारी मीडिया कर्मी के सवाल सुनकर असहज हो गये। क्योंकि जब इस मीडिया कर्मी द्वारा पुलिस के अधिकारियों से यह सवाल पूछा गया कि दीपक द्वारा जब एक इंसान की मदद की जा रही थी तो वीडियो वायरल होने के बाद भी पुलिस द्वारा क्योें दीपक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया? जब इस मीडियाकर्मी की यह खबर वायरल हुई तो अब पौड़ी जिले के पुलिस अधिकारियों द्वारा कोटद्वार में मीडिया के घुसने पर ही प्रतिबंद्ध लगा दिया गया है। क्या यह प्रशासन द्वारा सही फैसला किया गया है यह सोचनीय विषय है।

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