जिस भ्रष्टाचार की बीमारी के उपचार के लिए अन्ना हजारे जैसे समाजसेवियों ने अपनी जान की बाजी लगा दी उस देश में इस वक्त जब नरेंद्र मोदी की वह सरकार है जो बीते 11 सालों से सत्ता में है जिनका दावा था कि न खाऊंगा न खाने दूंगा अगर दिल्ली के रक्षा मंत्रालय में तैनात एक लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक शर्मा को रंगे हाथों लाखों की रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है तथा जब सीबीआई उसके ठिकानों पर छापेमारी करती है तो उसके घर से 2 करोड़ 26 लाख रुपए की नगदी बरामद होती है। जो इस देश की सुरक्षा से खिलवाड़ का एक जीता जागता सबूत तो है ही साथ ही यह उस सेना की वर्दी पर लगा एक ऐसा दाग है जो किसी डिटर्जेंट पाउडर से साफ नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति दिल्ली के शास्त्री भवन रक्षा मंत्रालय में बैठा हों और जिसके पास देश के रक्षा सौदों का क्लीयरेंस देने की ताकत हो उसके ओहदे की अहमियत आसानी से समझी जा सकती है यही से करोड़ और अरबो के रक्षा सौदे होते हैं। सवाल यह है क्या कोई एक व्यक्ति इतने बड़े कारनामे को अंजाम दे सकता है इसका जवाब एकदम साफ है कि बिना शासन—प्रशासन की मिली भगत के कोई इतना सब करने का साहस नहीं कर सकता है अब इसके पूरे रैकेट की छानबीन सीबीआई कर रही है लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बड़े मुद्दे पर खामोशी ओढ़ रखी है। अभी बीते दिनों पीएमओ के तीन अधिकारियों ने अचानक जब अपने पदों से इस्तीफे दिए तो उनकी पृष्ठभूमि में भी भ्रष्टाचार का मुद्दा ही चर्चाओं के केंद्र में रहा था। इससे पूर्व दिल्ली में एक अन्य हाई प्रोफाइल मामले में जस्टिस वर्मा के आवास पर हुई आगजनी की वह घटना भी आपको याद होगी जिसमें करोड़ों की नगदी जलकर राख हो गई थी। इस खबर को कैसे छुपाने का प्रयास किया गया और इसकी आंच संसद भवन तक भी राज्यसभा के स्पीकर धनखड़ के इस्तीफे तक पहुंची थी। जस्टिस वर्मा जो कि अभी तक इस पैसे के अपना न होने की बात कर रहे हैं क्या कभी इस बात का पता चल सकेगा कि यह पैसा किसका था किसने इसे जस्टिस वर्मा के आवास तक पहुंचाया? शायद यह राज हमेशा एक राज ही बना रहेगा। मोदी सरकार के इस कार्यकाल के जो भ्रष्टाचार के कारनामे है उनका कच्चा चिट्ठा सत्ता परिवर्तन के बाद ही सामने आएगा। अब थोड़ी सी बात भाजपा शासित उत्तराखंड राज्य की भी कर ली जाए जहां आय से अधिक संपत्तियां अर्जित करने के तमाम मामलों में धामी सरकार ने चुप्पी साथ रखी है वहां अब एक भाजपा विधायक दुर्गेश लाल का नाम सुर्खियों में है। पुरोला से पहली बार विधायक चुनकर आए इन विधायक महोदय द्वारा मनरेगा मजदूरों में अपना और अपनी धर्मपत्नी का नाम दर्ज करा कर मजदूरों के हक पर ही डाका डाला जा रहा था। मनरेगा मजदूरी की किश्तें उनके खातों में आ रही थी और अब खुलासा होने पर वह इसे अपने खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र का नाम दे रहे हैं। विधायक जैसे किसी सम्माननीय पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इतने निम्न स्तर की हरकत की शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। मगर इससे भी हास्यास्पद बात यह है कि भाजपा नेताओं का उनके बचाव में उतरना। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली भाजपा और सीएम धामी क्या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने का साहस दिखाएंगे अपने आप को राष्ट्रवादी और चाल चरित्र तथा अनुशासित बताने वाली भाजपा का अब पूरा सच इस देश और प्रदेश की जनता के सामने आ चुका है। देखना यह है कि भाजपा के अंधभक्त कब तक उनकी जय—जय कार के नारे लगाते रहेंगे और इन्हें सत्ता सौंपते रहेंगे।



