बस! ऐसे ही चल रहा है देश

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केंद्र सरकार बीते एक दशक से इस देश के शासन—प्रशासन को कैसे चला रही है? अभी—अभी पीएमओ ऑफिस के कुछ अधिकारियों को हटाने या उनके इस्तीफो की घटना तथा इंडिगो की उड़ानों पर लगे ब्रेक की घटना की रोशनी में आसानी से समझा जा सकता है। इन दोनों घटनाओं ने न सिर्फ सरकार की कार्य प्रणाली का सारा सच सामने ला दिया है बल्कि देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात क्या है? इसकी हकीकत को बेपर्दा कर दिया है। देश ही नहीं पूरे विश्व में इंडिगो के ब्रेक डाउॅन की घटना को लेकर थू—थू हो रही है। जो सरकार एक एवियशन विभाग को नहीं संभाल सकती वह इस देश को चला रही है इससे बड़ा अजूबा और क्या हो सकता है? बीते तीन—चार दिनों से देश की सबसे बड़ी एवियशन कंपनी की उड़ानों को अचानक रोके जाने से देश भर के हवाई अड्डों पर फसें लाखों यात्रियों को जिनको कंफर्म टिकट दिए गए बिना कारण बताएं उनकी उड़ानों को अगर कैंसिल कर दिया जाए तो आप समझ सकते हैं कि हालात कैसे होंगे। हवाई अड्डे पर यात्रियों के हंगामें और आक्रोश की खबरें देश ही नहीं पूरा विश्व देख रहा है। लोकल यात्रियों ने भले ही कई कई गुना किराए खर्च कर अपने गंतव्य तक पहुंचने का रास्ता तलाश लिया गया हो लेकिन उन विदेश जाने वाले यात्रियों को अब तक भी कोई समाधान नहीं मिला है। भारत के सिविल एविएशन मंत्री राम मोहन नायडू अब भले ही इनके रहने खाने की व्यवस्था करने व नुकसान की भरपाई करने तथा इंडिगो पर सख्त जुर्माना करने की बात कह रहे हो लेकिन विश्व भर में इसे लेकर जो किरकिरी हुई उसकी क्या कोई सरकार भरपाई कर सकेगी। बात अगर इस समस्या के कारणों पर की जाए तो सरकार को इस बात की पूरी जानकारी थी कि डीजीसीए ने बीते 1 नवंबर को नए नियम बनाए थे उनका अनुपालन करने में इंडिगो जैसी बड़ी कंपनी जिसके पास देश के 60 से 65 फीसदी की हिस्सेदारी है जो प्रतिदिन 2000 से अधिक उड़ानों की सेवाएं दे रही है असमर्थ है। इसके बावजूद भी जब इंडिगो द्वारा कुछ समय और दिन की मांग की जा रही थी उसे समय क्यों नहीं दिया गया और अब जब उसने अपनी उड़ानों पर ब्रेक लगा दिया गया तो उसे 10 फरवरी तक का समय क्यों दे दिया गया। क्या सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों के पास इतनी भी समझ नहीं थी कि इसके क्या परिणाम होंगे और समस्या इतनी गंभीर भी हो सकती है जिसका सरकार के पास कोई समाधान नहीं होगा। सब कुछ सत्ता में बैठे लोग जानते थे लेकिन फिर भी इस संकट को पैदा होने दिया गया। वह भी अडानी जैसे बड़े पूंजी पतियों को लाभ दिलाने के लिए। इसके पीछे पायलटो की कमी की समस्या का ढोल बजाना और अडानी की कंपनी एटीओ द्वारा ट्रेंड किए गए हजारों पायलटो को नौकरी दिलाने के लिए। यह ठीक उन तीन काले कृषि कानून जैसा ही है जिसे देश के किसानों के भारी विरोध के सामने सरकार को वापस लेना पड़ा था और अडानी के वह खाघ भंडारण के गोदाम धरे के धरे रह गए थे। सरकार को अब एक एविएशन कंपनी के सामने घुटने टेकने पड़े हैं निश्चित तौर पर सत्ता में बैठे लोग कंपनी की मोनोपोली की बात कहकर उसके सर सिर्फ इसका ठीकरा ही नहीं फोड़ेंगे बल्कि उसे सजा देने और बर्बाद करने की योजना भी बनाएंगे ही। मगर इसे लेकर उनका सारा कच्चा चिट्ठा सार्वजनिक हो चुका है। ना खाऊंगा ना खाने दूंगा की बात करने वालों के पास पीएमओ ऑफिस के बड़े अधिकारियों के पीछे छिपे बड़े भ्रष्टाचार की कहानी के पन्ने भी खुल चुके हैं। एक गेमिंग एप के जरिए भी इतनी बड़ा भ्रष्टाचार हो सकता है इसे लेकर यह अधिकारियों के स्थिति और महादेव ऐप चर्चाओं के केंद्र में है। देश का शासन—प्रशासन कैसा चल रहा है। चुनाव में क्या हो रहा है। संसद में क्या हो रहा है तथा सरकार जो बड़ी बातें करती थी क्यों किसी भी सवाल पर अब खामोशी ओढे़ हुए हैं यह सब जनता की समझ में आ रहा है तो सत्ता में बैठे लोगों की समझ में आ ही रहा होगा।

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