बीते एक दशक में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा नए भारत की जो नई तस्वीर गढ़ी गई थी उसका असल चेहरा अब देशवासियों के सामने आ चुका है। दरअसल गलत तथ्यों और झूठे वायदों तथा और दावों के दम पर की जाने वाली ब्रांडिंग से न तो कोई व्यक्ति महान हो सकता है और न कोई राष्ट्र महान या विकसित बन सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी का चेहरा सामने रखकर विदेश में जमा काले धन को 100 दिन में वापस लाने और हर एक गरीब के खाते में 15—15 लाख रुपया डालकर देश से गरीबी मिटाने और अच्छे दिन लाने के वायदे को जिस अंदाज में परोस कर सत्ता हासिल की थी उस शुरुआत से लेकर आज तक जब सत्ता में बैठे लोग देश की जीडीपी को आठ फीसदी के पार बता रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने की बात का प्रचार कर रहे हैं सब कुछ तथ्यों से परे और भ्रामक है। स्व. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के समय जब सिर्फ एक बार जीडीपी 7 फीसदी के आसपास पहुंची थी तब लोगों की जब में पैसा था तथा बैंक के बचत खातों में भी पैसे थे और उनकी क्रय क्षमता भी इस दौर से बेहतर थी। वर्तमान समय में देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति को लेकर तथा बाजार की स्थिति को लेकर विशेषज्ञों और समाज शास्त्रियों द्वारा जिस तरह की आशंकाएं जताई जा रही है वह बेवजह नहीं है। जब देश का लघु उघोग और कृषि क्षेत्र संकट में है और देश के युवाओं के पास रोजगार नहीं है तो फिर देश की तरक्की की बात किस आधार पर की जा रही है यह किसी के लिए भी समझ से परे है। अगर देश की अर्थव्यवस्था में इतना सुधार आया है कि जीडीपी 8 फीसदी के पार पहुंच चुकी है तो फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपया इतना कमजोर क्यों होता जा रहा है कि उसकी गिरावट की कोई सीमा ही नहीं रह गई है। क्यों महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है? क्यों खाद व बीज खरीदने के लिए किसानों को सम्मान निधि देने की जरूरत है? क्यों देश के 80 करोड लोगों को मुफ्त राशन बांटा जा रहा है? बहुत सारे सवाल है क्यों आईएफएन द्वारा भारत को सी ग्रेड में डाल दिया गया है। चुनाव जीतना या गलत तथ्यों के आधार पर फेस ब्रांडिंग का काम असलियत को अधिक समय छुपा कर नहीं रख सकता है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का शगुफा भी काला धन वापस लाने जैसा ही है इस बात को अब हर आम आदमी भी जान चुका है। सत्ता में रहते हुए वर्तमान सरकार द्वारा किसानों के कल्याण में एक काम तक नहीं किया गया है। सालों तक एमएसपी की गारंटी के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे किसानों की बात क्या सरकार ने मानी? इसके उलट उनके खिलाफ तीन नए कृषि कानून जो उन्हें किसान से मजदूर बनाने की ओर धकेलने वाले थे लाने का प्रयास किया गया। सबका साथ सबका विकास की बात करने वाली सरकार ने पिछड़े और अल्पसंख्यकों की कल्याण के लिए क्या किया गया है, 10 सालों में बताने के लिए कुछ भी नहीं है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से देश की आम अवाम को क्या क्या फायदा हुआ है तथा सेना में स्थाई नियुक्तियों की जगह अग्नि वीरों की भर्ती से देश की सुरक्षा व्यवस्था व सेना को कितनी मजबूती मिली है इस सवाल का जवाब 10 साल से सत्ता में बैठे लोगों के पास नहीं है। सत्ता में बैठे लोग आज अगर संसद के अंदर तथा बाहर जनप्रतिनिधियों व जनता के सवालों से इतना असहज दिखाई दे रहे हैं तो वह बेवजह नहीं है और अगर आप उन सवाल करने वालो पर लाठियां चलवाते हैं या उन्हें जेल में डालने का डर दिखाते हैं तो उससे लोग कितने समय तक चुप रह सकते हैं। यह सत्ता में बैठे लोगों के लिए एक विचारणीय सवाल है।




