भले ही पेपर लीक मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति किए जाने और युवा बेरोजगारों के आंदोलन को स्थगित करने की घटना को कई दिन बीत चुके हो लेकिन राजनीतिक हल्को में इस मुद्दे को लेकर कई तरह की चर्चाओं का बाजार अभी भी गर्म है। जहां इसका श्रेय लेने की होड़ में भाजपा के नेता अपनी ही कुर्ता घसीटन कर रहे हैं। वही मुख्यमंत्री धामी के इस फैसले को लेकर इस पर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सीएम जिन्हें लोगों ने अब धाकड़ धामी की उपाधि से नवाज रखा है अचानक उन युवाओं के सामने झुकने पर क्यों मजबूर हो गए जिन्हें आंदोलन के पहले ही दिन से अराजक तत्व बताकर उन पर राज्य का माहौल खराब करने का आरोप लगाया जा रहा था। कोई उन्हें सनातन विरोधी बता रहा था तो कोई राष्ट्रीय विरोधी। खुद मुख्यमंत्री धामी ने उनके इस आंदोलन को नकल जिहाद तक कहा गया था। सत्ता में बैठे लोग इसे पेपर लीक की घटना तक मानने को तैयार नहीं थे। फिर और भी आगे जाकर कुछ भाजपा के नेताओं ने इस आंदोलन को समाप्त करने के लिए इसके समानांतर एक और छद्म संगठन खड़ा कर आंदोलन की रूप रेखा पर भी काम करना शुरू कर दिया था। भाजपा की पूरी ट्रोलर आर्मी इन युवाओं के आंदोलन पर टूट पड़ी थी। यही नहीं भाजपा के समर्थन में आंखें मूंद कर खड़ा रहने वाले मीडिया का भी भरपूर सहयोग सत्ता को मिल रहा था। इस सबके बावजूद भी अचानक यदि धाकड़ धामी युवाओं के धरना स्थल पर जाकर खड़े हो जाए और युवाओं से उनके समर्थन में खुद भी धरने पर बैठने जैसी बातें करने लगे तथा ऑन द स्पॉट सीबीआई जांच की संस्तुति करें तो लोगों का चौंकना भी स्वाभाविक है। अब लोग अपनी—अपनी जानकारी तथा समझ के अनुसार उनके पीछे की इनसाइड स्टोरी तलाश रहे हैं। लेकिन धाकड़ धामी का यह फैसला बेवजह तो नहीं है अगर सीबीआई जांच की मांग की बात मान लेना इतना अहम बात नहीं होती तो सीएम ने अंकिता भंडारी हत्याकांड में भी सीबीआई जांच की मांग बहुत पहले दे दी होती। क्या इस आंदोलन से धाकड़ धामी डर गए थे? क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं हो सका था कि आंदोलन इतना व्यापक रूप ले लेगा क्या उन्हें इस बात की भनक लग गई थी कि रिकॉर्ड समय तक सीएम रहने का रिकॉर्ड बनाने जा रहे धामी के खिलाफ उनकी ही पार्टी के कुछ नेता उन्हें बाहर करने का षड्यंत्र इस आंदोलन के माध्यम से कर रहे हैं? यही नहीं अब जब एन वक्त पर इन नेताओं का दांव असफल हो गया तो उनकी बौखलाहट श्रेय लेने की होड़ के रूप में सामने आ रही है। दरअसल सीएम की कुर्सी की चाह का जादू है ही कुछ ऐसा कि इसके लिए नेता कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। भ्रष्टाचार पर आंखें मूंदकर बैठने से लेकर झूठ बोलने तथा जादू टोना का सहारा लेने ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी को भी बड़ा नुकसान करने तक नहीं चूकते। जो भी इस कुर्सी पर एक बार बैठ जाता है उसे अगर कुर्सी छोड़नी पड़ जाए तो ऐसे नेताओं की तो बात ही क्या करनी वह जीवन भर वैसे ही बने रहते हैं जैसे एक अबोध बालक ट्टमैया मैं तो चंद्र खिलौना लेहू’ की जिद पर अड़ा रहता है। खैर छोड़िए यह सत्ता की बात आप सिर्फ धाकड़ धामी के यू—टर्न के निःतार्थ तलाशिये।




