उपराष्ट्रपति चुनाव का नतीजा आ चुका है। एनडीए प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन अब देश के उपराष्ट्रपति बन चुके हैं। इंडिया गठबंधन द्वारा चुनाव में अपनी प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतारे गए बी. सुदर्शन रेड्डी चुनाव हार गए। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के आकस्मिक इस्तीफे के कारण चर्चाओं के केंद्र में रहे उपराष्ट्रपति के इस चुनाव पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई थी जबकि हर कोई इस बात से भी बखूबी वाकिफ था कि लोकसभा और राज्यसभा के कुल सदस्यों की 781 संख्या में एनडीए के बहुमत या जीत के लिए जरूरी 391 के आंकड़े से अधिक संख्या बल है लेकिन इस चुनाव को इंडिया गठबंधन द्वारा विचारधारा की लड़ाई बताकर तथा बी. सुदर्शन रेड्डी द्वारा की गई आत्मा की आवाज पर वोट करने की अपील नें अधिक दिलचस्प बना दिया था। सत्ता के सहयोगी दलों की नाराजगी को लेकर भी इस चुनाव में क्रॉस वोटिंग का जो शोर सुनाई दे रहा था उससे भी इसके परिणाम को लेकर सत्ता पक्ष के खेमे में भारी बेचैनी देखी जा रही थी हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इस चुनाव में भले ही एनडीए प्रत्याशी राधाकृष्णन 400 के पार वोट हासिल कर चुनाव जीत गए हो लेकिन सुदर्शन रेड्डी ने 300 मत हासिल कर अब तक हारने वालों में सर्वाधिक मत हासिल करने का रिकॉर्ड बना दिया। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन द्वारा इस हार को भी अपनी जीत की तरह ही देखा जा रहा है। वहीं भले ही भाजपा या एनडीए इस चुनाव में जीत गई हो जीत के बाद इसका उत्साह सिर्फ सत्ता समर्थित मीडिया तक ही देखा जा रहा है उसके नेताओं के चेहरे पर अभी भी चिंता की लकीरें साफ देखी जा रही है। इसका कारण भी बहुत स्पष्ट है इस चुनाव में इंडिया गठबंधन के नेताओं द्वारा न सिर्फ उत्साह पूर्ण इस चुनाव को लड़ा गया है बल्कि रेड्डी को मिले 300 वोट इस गठबंधन की एकजुटता का सबूत भी दे रहे हैं। जिस गठबंधन के नेता राहुल गांधी के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने कभी कहा था कि कौन राहुल उनके नेतृत्व की उस इंडिया गठबंधन में स्वीकार्यता नहीं है। जिसे भाजपा के नेता और पीएम इंडी कहकर उसका मजाक बनाते रहे थे उन्हें अब इस चुनाव परिणाम से यह पता चल चुका है कि यह गठबंधन और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अब सत्ता पक्ष के लिए कितनी बड़ी मुसीबत बन चुके हैं। हर चुनाव सिर्फ जीत के लिए भी नहीं लड़ा जाता हैै। यह कांग्रेस व इंडिया गठबंधन को भी पता था कि उसकी जीत की संभावनाएं कितनी कम है लेकिन कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने भाजपा व एनडीए के लिए खुला मैदान भी नहीं छोड़ा गया। विपक्ष ने इस चुनाव में जिस तरह की एकता और मजबूती का प्रदर्शन किया है उसका ही नतीजा है कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा से लेकर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता जैसे मुद्दे चुनाव के दौरान मुख्य विमर्श में बने रहे। किसी भी चुनाव में हार या जीत ही मायने नहीं रखती है बल्कि एक नरेशन भी सेट होता है। जिसमें विपक्ष पूर्णतया कामयाब रहा है। गठबंधन के नेता चुनाव हारने के बाद भी अगर खुश दिखाई दे रहे हैं तो इसके पीछे जो जीत का संदेश छिपा है उसे समझना भी जरूरी है इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि विपक्ष पहले से अधिक मजबूत हुआ है और आने वाले समय में वह बहुत ही मजबूती से सत्ता पक्ष के खिलाफ चुनाव लड़ने को तैयार है। इस चुनाव के बाद यह साफ हो गया है कि सत्ता पक्ष के लिए आगामी लड़ाई कितनी मुश्किल होगी। भाजपा के नेताओं द्वारा इस जीत के बाद जिस तरह वही पुरानी घिसी पिटी बयान बाजी की जा रही है वहीं विपक्ष के नेताओं द्वारा यह कहा जाना कि आप हार गए या जीत गए यह बात महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है कि आप किस विचारधारा के साथ खड़े हैं। अखिलेश यादव का कहना है कि हम राधा कृष्ण जी को बधाई देते हैं अच्छा हो कि वह उपराष्ट्रपति बनकर अपना कर्तव्य निभाएं भाजपा का प्रवक्ता न बने। अच्छा हुआ कि एनडीए यह चुनाव जीत गई अन्यथा भाजपा व एनडीए की सरकार का भविष्य ही दांव पर लग गया होता।




