चुनाव से पूर्व सत्ता की जोड़—तोड़

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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पूर्व सूबे के दोनों प्रमुख सियासी दल कांग्रेस और भाजपा के अंदर जिस तरह का घमासान देखा जा रहा है वह इन दलों के लिए कितना लाभकारी और हानिकारक सिद्ध होगा यह भले ही अभी पता न चले लेकिन सूबे की सियासत की जो दिशा और दशा देखी जा रही है वह भावी भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। चुनाव से पूर्व नेताओं और दलों द्वारा अपने—अपने निजी हितों के अनुरूप इस दल से उस दल में आना जाना उनकी अवसरवादिता का परिचायक तो है ही साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि इन नेताओं को राज्य से कितना सरोकार है। चुनाव में अभी कई महीने का समय है लेकिन हर पार्टी नेता ट्यूट कर सनसनीखेज जानकारियां दे रहे हैं कि कल एक प्रख्यात व्यक्ति अमुक पार्टी से जुड़ रहा है। इन दिनों इन नेताओं पर इसके अलावा शायद कोई काम नहीं है कि कौन आ रहा है कौन जा रहा पर चर्चा करते रहे। इन पार्टियों ने इन दिनों इसे तोड़ो उसे तोड़ो जैसा अभियान छेड़ा हुआ है। चुनाव परिणाम आने के बाद सत्ता के जोड़—तोड़ और जुगाड़ करने तथा विधायकों की खरीद—फरोख्त का चलन जैसे राजनीति में आम हो गया है ठीक वैसे ही चुनाव से पूर्व यह राजनीतिक दल और नेता एक दूसरे का मनोबल तोड़ने और प्रतिद्वंदी दलों को कमजोर कर चुनाव में अपना पलड़ा भारी करने की होड़ में लगे हुए हैं। जिन नेताओं के नाम इस दल बदल की चर्चाओं में आते हैं वह या तो जवाब देने से कतराते फिरते हैं या फिर उन्हें बार—बार सफाईयंा देनी पड़ती है कि वह जिस पार्टी में है उसी में रहेंगे कहीं नहीं जा रहे हैं। सोशल मीडिया जो इस काम में अहम भूमिका निभा रहा है पार्टी के कुछ समर्थक नेताओं के बारे में भी भ्रामक खबरें फैला कर उनकी छवि को अपनी ही पार्टी में संदिग्ध बनाने का काम किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि इन दलों द्वारा अपने नेताओं को अलग से इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वह एक एक नेता को सूघ्ंाकर पता लगाते हैं कि कौन सा नेता अपनी पार्टी व नेतृत्व से असंतुष्ट है। और फिर शुरू हो जाता है अफवाहें फैलाने का काम। सवाल यह है कि क्या यही है वर्तमान की राजनीति और उसका उद्देश्य। राजनीति में कोई भी नेता भले ही उसका कद और पद चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए कभी संतुष्ट नहीं हो सकता है। इन नेताओं की महत्वकांशाए आसमान से भी बड़ी हो जाती है जिसके कारण राजनीति का मूल उद्देश्य ही कहीं गुम हो जाता है। देवभूमि के लोग राज्य गठन के 20 साल बाद भी सूबे के नेताओं और राजनीतिक के इस रूप को देखकर हैरान ही नहीं अपितु यह कहने पर मजबूर है कि इससे तो अच्छा होता की यह अलग राज्य बना ही नहीं होता। यह सवाल उन तमाम नेताओं के लिए विचारणीय है जो सीएम और मंत्री तथा विधायक बनने का सपना देख रहे हैं?

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