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उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले

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  • 2655 विद्यालय है मात्र एक शिक्षक के भरोसे
  • खाली गांवों से सिकुड़ रहा शिक्षा का आधार
  • माध्यमिक स्तर पर 4745 प्रवक्ता पद खाली
  • 3937 पदों की पदोन्नति न्यायिक अड़चन में


देहरादून। उत्तराखंड को बने 25 वर्ष पूरे होने के बाद विकास की उपलब्धियों के बीच सरकारी शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ पहाड़ के गांवों से लगातार घटती छात्र संख्या के कारण सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है, तो दूसरी तरफ जिन विद्यालयों में बच्चे पढ़ रहे हैं, वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों में शून्य छात्र नामांकन के कारण 826 सरकारी प्राथमिक विद्यालय बंद अथवा दूसरे विद्यालयों में विलय किए जा चुके हैं। वहीं नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 के अनुसार राज्य में 2,655 विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक तैनात है। माध्यमिक शिक्षा का संकट इससे अलग और अधिक गंभीर है। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद रिक्त हैं। इनमें से 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, जबकि 3,937 पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने हैं और न्यायिक रोक के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित है। इसका असर विषयवार पढ़ाई से लेकर विद्यालयों के प्रशासन तक दिखाई दे रहा है।
सरकार की ओर से विधानसभा में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि विद्यालय बंद होने की समस्या मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में केंद्रित है। पांच वर्षों में सबसे अधिक 262 प्राथमिक विद्यालय टिहरी गढ़वाल में बंद हुए। इसके बाद पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 विद्यालय बंद हुए। नैनीताल में 49, चमोली में 43, देहरादून में 38, चंपावत में 34, बागेश्वर में 30, उत्तरकाशी में 25, ऊधमसिंह नगर में 21, रुद्रप्रयाग में 15 और हरिद्वार में दो विद्यालय बंद हुए। इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने की कहानी केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों में बदलती जनसंख्या का संकट भी जुड़ा हुआ है। जिस गांव में बच्चों की संख्या लगातार घटती जाती है, वहां विद्यालय चलाना विभाग के लिए कठिन होता जाता है। लेकिन दूसरी तरफ विद्यालय का बंद होना उस गांव के सामाजिक जीवन को और कमजोर कर सकता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि विद्यालय में बच्चे कितने हैं। सवाल यह भी है कि बच्चे गांव में क्यों नहीं हैं और गांव में बच्चों को रोकने के लिए शिक्षा व्यवस्था कितनी सक्षम है।
जिलेवार आंकड़ों में पर्वतीय और मैदानी उत्तराखंड के बीच का अंतर भी साफ दिखाई देता है। टिहरी में 262 विद्यालय बंद हुए, जबकि हरिद्वार में केवल दो। पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय जिलों में भी बंद विद्यालयों की संख्या काफी अधिक रही। यह अंतर उत्तराखंड के उस पुराने सवाल को सामने लाता है, जिस पर राज्य बनने के बाद से लगातार चर्चा होती रही है कि क्या पहाड़ में शिक्षा की व्यवस्था केवल विद्यालय खोलकर मजबूत की जा सकती है, या इसके लिए गांवों में आबादी और रोजगार का टिकना भी जरूरी है? यदि गांवों से परिवार बाहर जा रहे हैं, खेती और स्थानीय रोजगार के अवसर घट रहे हैं और नई पीढ़ी शिक्षा व रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रही है, तो विद्यालयों में नामांकन स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगा। लेकिन विद्यालय बंद होने के बाद बचे हुए परिवारों के बच्चों को दूर स्थित विद्यालय तक पहुंचाने की समस्या भी बढ़ती है।
उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दूसरी बड़ी चुनौती शिक्षक उपलब्धता है। नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 में राज्य के 2,655 एकल-शिक्षक विद्यालय दर्ज हैं। संसद में प्रस्तुत केंद्र सरकार के आंकड़ों में भी उत्तराखंड के लिए यही संख्या दर्ज है। इससे पहले राज्य में 2,959 एकल-शिक्षक विद्यालय होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इस आंकड़े को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट के संदर्भ में भी चिंता जताई गई। बाद के यूडीआईएसई आंकड़े में संख्या 2,655 दर्ज है। इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या का अंतर रिपोर्टिंग वर्ष और आंकड़ों के स्रोत के कारण हो सकता है। एकल-शिक्षक विद्यालय की वास्तविक चुनौती पहाड़ी क्षेत्रों में और अधिक जटिल हो जाती है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक को एक साथ अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना पड़ता है। पढ़ाई के अलावा प्रशासनिक कार्य, अभिलेख, विभागीय सूचनाएं और अन्य जिम्मेदारियां भी उसी शिक्षक के हिस्से में आती हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक शिक्षक से एक साथ शिक्षण, मूल्यांकन, प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन की सभी जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा किस हद तक व्यावहारिक है। प्राथमिक विद्यालयों में जहां छात्र संख्या और एकल शिक्षक बड़ी समस्या है, वहीं माध्यमिक शिक्षा में शिक्षक पदों की रिक्तियां चिंता बढ़ा रही हैं। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद खाली बताए गए हैं। सरकार के अनुसार 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन 3,937 पद पदोन्नति से भरे जाने की प्रक्रिया न्यायिक रोक के कारण प्रभावित हुई। इसका सीधा असर उन विद्यालयों पर पड़ता है जहां किसी विषय का स्थायी शिक्षक उपलब्ध नहीं है। विज्ञान, गणित, भाषा और अन्य विषयों में शिक्षक की कमी का प्रभाव विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर पड़ सकता है। यहां शिक्षा व्यवस्था का एक विरोधाभास भी सामने आता है कि एक ओर कई विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या इतनी कम है कि विद्यालय बंद करने की नौबत आ रही है, दूसरी ओर मौजूद विद्यालयों में हजारों शिक्षक पद खाली हैं।
शिक्षा व्यवस्था में केवल शिक्षकों की कमी ही नहीं है। विद्यालयों के प्रशासनिक नेतृत्व का संकट भी सामने है। सल्ट विधानसभा क्षेत्र में 59 माध्यमिक विद्यालयों में से 37 में स्थायी प्रधानाचार्य नहीं हैं। इन विद्यालयों में कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे काम चलाया जा रहा है। प्रधानाचार्य किसी विद्यालय में केवल प्रशासनिक पद नहीं होता। विद्यालय की शैक्षणिक योजना, शिक्षकों के बीच समन्वय, अनुशासन, अभिभावकों से संवाद और विभागीय कार्यों में प्रधानाचार्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लंबे समय तक स्थायी प्रधानाचार्य नहीं होने से विद्यालय संचालन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। शिक्षक और छात्र संकट के साथ सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार 2,210 सरकारी विद्यालयों की इमारतों की स्थिति खराब बताई गई है। 2024-25 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में पौड़ी गढ़वाल में ऐसे विद्यालयों की संख्या 330 बताई गई थी। उसी रिपोर्ट में 361 विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय और 130 विद्यालयों में पेयजल सुविधा नहीं होने की जानकारी दी गई थी।
जर्जर विद्यालय भवनों का संकट नया नहीं है। शिक्षा विभाग ने पहले भी वर्षाकाल में ऐसे भवनों में कक्षाएं संचालित नहीं करने के निर्देश दिए हैं। 2023 की विभागीय रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश में 2,785 सरकारी स्कूल भवनों को जर्जर बताया गया था, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि अलग-अलग वर्षों और मानकों के कारण जर्जर भवनों के आंकड़ों में अंतर मिलता है। विद्यालय में शिक्षक और भवन होने के बाद भी यदि बिजली, पानी, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल बना रहता है। पुराने सरकारी आंकड़ों में उत्तराखंड के बड़ी संख्या में विद्यालयों में बिजली, पुस्तकालय, खेल मैदान, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाओं की कमी दर्ज की गई थी। समय के साथ कई सुविधाओं में सुधार हुआ है, इसलिए पुराने आंकड़ों को वर्तमान स्थिति का सीधा प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। फिर भी पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक कठिनाइयां, मौसम, सड़क संपर्क और निर्माण की लागत जैसी समस्याएं शिक्षा के बुनियादी ढांचे को लगातार चुनौती देती हैं।
उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों की मौजूदा तस्वीर को केवल शिक्षा विभाग की विफलता या उपलब्धि के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़क संपर्क और गांवों की जनसांख्यिकी भी जुड़ी है। यदि किसी गांव में परिवार ही नहीं बचेंगे तो विद्यालय में विद्यार्थी कहां से आएंगे? और यदि विद्यालय बंद कर दिए जाएंगे तो गांव में बचे परिवार अपने बच्चों को लेकर वहां कितने समय तक टिके रहेंगे? यही वह बिंदु है जहां शिक्षा और पलायन का रिश्ता एक-दूसरे को प्रभावित करता दिखाई देता है। राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कई पहल कर रही है। मार्च 2026 में शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने सरकार की ओर से विद्यालयी शिक्षा में आधारभूत ढांचे, आधुनिक संसाधनों, नई शिक्षण पद्धतियों और शिक्षक कौशल पर जोर दिए जाने की बात कही थी। समग्र शिक्षा उत्तराखंड के स्तर पर भी शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यालय सुधार से जुड़ी गतिविधियां जारी हैं। 2026 में 50 सरकारी विद्यालयों में आधुनिक शिक्षण माडल लागू करने की पहल भी सामने आई है।
सरकार शिक्षा में फिनलैंड जैसी आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से सीख लेने की दिशा में भी विचार कर रही है। लेकिन फिनलैंड की किसी पद्धति को अपनाने से पहले उत्तराखंड की अपनी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था में उच्च प्रशिक्षित शिक्षकों, शैक्षणिक स्वायत्तता, सीखने में समान अवसर और विद्यार्थियों की जरूरत के अनुसार सहायता पर जोर दिया जाता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के सामने अब केवल यह चुनौती नहीं है कि कितने विद्यालय बनाए जाएं। चुनौती यह भी है कि कितने विद्यालय बचाए जाएं, कितने बच्चों को गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और कितने परिवारों को गांव छोड़ने से रोका जा सके। 826 विद्यालयों का बंद होना महज 826 भवनों का खाली होना नहीं है। प्रत्येक विद्यालय किसी गांव के सामाजिक और सामुदायिक जीवन का केंद्र भी रहा है। विद्यालय बंद होने का अर्थ कई जगहों पर बच्चों को दूसरे गांव तक भेजना, अभिभावकों के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी और गांव के सार्वजनिक जीवन में एक और कमी होना है। दूसरी ओर हजारों विद्यालयों का एक शिक्षक के भरोसे चलना बताता है कि जहां विद्यार्थी मौजूद हैं, वहां पर्याप्त मानवीय संसाधन उपलब्ध कराने की चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। माध्यमिक स्तर पर 4,745 प्रवक्ता पदों की रिक्ति और 3,937 पदोन्नतियों का न्यायिक अड़चन में फंसना इस संकट को और बड़ा करता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि सरकार बंद हो चुके विद्यालयों की संख्या गिनने से आगे बढ़कर उन कारणों को कैसे संबोधित करेगी, जिनकी वजह से विद्यालय खाली हुए और जो विद्यालय चल रहे हैं, वहां बच्चों को पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब तक मिलेगी। क्योंकि पहाड़ में स्कूल का बचना केवल शिक्षा विभाग की उपलब्धि नहीं होगा कि यह उस गांव में जीवन के बचे रहने का भी संकेत होगा।

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