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सीमा पर सहमति, रिश्तों में भरोसा

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भारत और नेपाल के बीच सीमा केवल नक्शे पर खिंची कोई लकीर नहीं है। यह रिश्तों, रोजमर्रा की आवाजाही, कारोबार, संस्कृति और सदियों पुराने सामाजिक संपर्क की साझा जमीन है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर बनी सहमति का महत्व सामान्य कूटनीतिक बैठक से कहीं बड़ा है। देहरादून में 20-21 अगस्त को हुई भारत-नेपाल संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक में सीमा पार अपराध, सीमा अवसंरचना, एकीकृत जांच चौकियों, सड़क-रेल संपर्क, अतिक्रमण और सीमा स्तंभों के रख-रखाव जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई तथा दोनों देशों ने सहयोग मजबूत रखने पर सहमति जताई। भारत-नेपाल सीमा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी खुली प्रकृति है। यही खुलापन दोनों देशों की ताकत भी है और चुनौती भी। सामान्य नागरिकों की आवाजाही और सामाजिक रिश्तों के बीच तस्करी, अवैध गतिविधियों और सीमा पार अपराध के रास्ते खुलना दोनों देशों की चिंता है। इसलिए सुरक्षा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि सीमा को अचानक दीवार में बदल दिया जाए। असली चुनौती यह है कि सीमा सुरक्षित भी रहे और दोनों देशों के नागरिकों की ऐतिहासिक सहजता भी बनी रहे। देहरादून की बैठक से एक महत्वपूर्ण संदेश यह निकलता है कि भारत और नेपाल ने सीमा संबंधी सवालों को टकराव के बजाय संवाद और संस्थागत तंत्र के जरिए हल करने का रास्ता चुना है। सीमा स्तंभों के रखरखाव और अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर तकनीक तथा बेहतर समन्वय का इस्तेमाल विवादों को स्थानीय तनाव बनने से रोक सकता है। हाल में दशगजा क्षेत्र में अतिक्रमण की पहचान के लिए ड्रोन मैपिंग पर सहमति की खबरें भी सामने आई हैं। लेकिन कागज पर बनी सहमति तभी सार्थक होगी जब वह सीमा पर दिखाई भी दे। सीमा चौकियों की क्षमता बढ़ाना, आधुनिक निगरानी व्यवस्था विकसित करना और सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा के नाम पर सीमा से जुड़े आम लोगों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। उत्तराखंड के लिए इस बैठक का महत्व और अधिक है। राज्य की लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा और सीमांत क्षेत्रों की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए सीमा सुरक्षा को केवल पुलिस या सुरक्षा बलों का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। सीमांत गांवों में सड़क, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी सुविधाएं भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा हैं, जिस सीमा पर गांव मजबूत होंगे, वहां सीमा प्रबंधन भी अधिक प्रभावी होगा। भारत और नेपाल के रिश्तों की सबसे बड़ी पूंजी जनता के बीच का भरोसा है। इसलिए सीमा सुरक्षा की हर नीति में स्थानीय समाज को भागीदार बनाना होगा। दोनों देशों के बीच यदि सुरक्षा सहयोग बढ़ता है तो उसके साथ व्यापार, पर्यटन, सांस्कृतिक संपर्क और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को भी गति मिलनी चाहिए। आज जब दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं, भारत और नेपाल के लिए आपसी भरोसा पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। सीमा पर चौकसी जरूरी है, लेकिन रिश्तों में संदेह नहीं। सुरक्षा मजबूत हो, मगर संवाद कमजोर न पड़े। यही भारत-नेपाल संबंधों की सबसे बड़ी कसौटी है। देहरादून की बैठक को इसलिए केवल सीमा सुरक्षा की बैठक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह इस बात की परीक्षा भी है कि दोनों देश अपनी साझा सीमा को तनाव की रेखा बनाने के बजाय सहयोग का गलियारा बना सकते हैं या नहीं। सहमति हुई है और अब उसकी असली परीक्षा जमीन पर है।

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