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जंतर-मंतर सीजन-2

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जंतर-मंतर फिर चर्चा में है। काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने जंतर-मंतर सीजन-2 जल्द शुरू करने का एलान किया है। यह घोषणा उस आंदोलन के कुछ ही सप्ताह बाद हुई है, जिसने दिल्ली के इस धरना स्थल को छात्रों, युवाओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों का बड़ा मंच बना दिया था। सवाल यह नहीं है कि जंतर-मंतर का दूसरा सीजन आएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या दूसरा सीजन पहले से उठाए गए सवालों के जवाब तलाशेगा या सिर्फ विरोध की राजनीति का अगला एपिसोड बनेगा? पहले चरण में परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, युवाओं के भविष्य और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसे मुद्दे आंदोलन के केंद्र में रहे। सोनम वांगचुक के अनशन से लेकर छात्रों की बड़ी मौजूदगी तक, आंदोलन ने यह दिखाया कि प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता और रोजगार की चिंता केवल राजनीतिक भाषणों के विषय नहीं हैं। वह लाखों परिवारों की रोजमर्रा की बेचौनी हैं। लेकिन किसी भी आंदोलन की असली परीक्षा भीड़ से नहीं, उसके बाद की दिशा से होती है। जंतर-मंतर पर भीड़ जुटाना अपेक्षाकृत आसान है। कैमरे जुट जाते हैं, नारे गूंजते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते हैं। कठिन काम उसके बाद शुरू होता हैकृसरकार से सवाल पूछना, जवाब मांगना, दस्तावेज सामने रखना और यह बताना कि व्यवस्था में बदलाव आखिर किस तरह होगा। यही वह कसौटी है जिस पर सीजन-2 को खरा उतरना होगा। अगर दूसरा चरण फिर केवल इस्तीफे की मांग तक सीमित रहा, तो आंदोलन का दायरा छोटा हो जाएगा। शिक्षा व्यवस्था की समस्या किसी एक मंत्री के चेहरे से बड़ी है। एनटीए की कार्यप्रणाली, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था, पेपर की सुरक्षा, पारदर्शिता, परिणामों की विश्वसनीयता और विद्यार्थियों की शिकायतों के निवारण की व्यवस्थाकृइन सभी पर ठोस सवाल हैं। युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि कौन जिम्मेदार है? वह यह भी पूछ रहा है कि अब व्यवस्था बदलेगी कैसे? यही फर्क आंदोलन को राजनीतिक प्रदर्शन से जनआंदोलन बनाता है। सीजेपी की पहली मुहिम ने एक और सवाल खड़ा किया था क्या आज के युवाओं के पास पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग अपनी राजनीतिक भाषा बनाने की जगह है? काकरोच जनता पार्टी जैसा नाम अपने आप में स्थापित राजनीतिक शब्दावली का व्यंग्य है। लेकिन व्यंग्य तभी राजनीतिक ताकत बनता है, जब उसके पीछे स्पष्ट विचार और ठोस कार्यक्रम हो। वरना आंदोलन भी सोशल मीडिया के कंटेंट में बदल सकता है। जंतर-मंतर का पहला दौर लंबा चला। अलग-अलग समूहों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने इसे व्यापक बनाया। लेकिन ऐसे आंदोलनों में नेतृत्व, उद्देश्य और रणनीति की स्पष्टता हमेशा जरूरी होती है। विरोध जितना बड़ा हो, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। इसलिए सीजन-2 के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार नहीं, विश्वसनीयता है। दीपके ने घोषणा की है, लेकिन घोषणा के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि दूसरे चरण का एजेंडा क्या होगा। कौन-कौन से सवाल उठाए जाएंगे? सरकार से क्या समयबद्ध मांग की जाएगी? छात्रों के लिए क्या वैकल्पिक प्रस्ताव है? परीक्षा सुधार को लेकर सीजेपी की ठोस रूपरेखा क्या है? लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सत्ता का जवाब देना। लेकिन आंदोलनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वह तथ्य और तर्क के साथ जनता के सामने जाएं। जंतर-मंतर किसी एक संगठन की निजी जमीन नहीं है। यह लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक है। यहां सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है तो आंदोलन के तरीके पर सवाल पूछने का अधिकार भी जनता के पास है। इसलिए सीजन-2 को केवल सीजन-1 का दोहराव नहीं होना चाहिए। पहले चरण ने सवाल खड़े किए। अब दूसरे चरण को जवाबों की मांग करनी होगी। पहले चरण में गुस्सा था। दूसरे चरण में नीति होनी चाहिए। पहले चरण में नारे थे। दूसरे चरण में दस्तावेज होने चाहिए। पहले चरण में भीड़ थी। दूसरे चरण में रोडमैप होना चाहिए और सबसे जरूरी पहले चरण में जिन युवाओं ने अपना समय और भरोसा दिया, दूसरे चरण में उनकी आवाज नेतृत्व के केंद्र में होनी चाहिए। भारत का युवा सिर्फ राजनीति का दर्शक नहीं रहना चाहता। वह अपने भविष्य का हिस्सेदार बनना चाहता है। परीक्षा की तारीख, परिणाम, नौकरी, शिक्षा की फीस और पारदर्शी व्यवस्था उसके लिए टीवी की बहस नहीं, जिंदगी का सवाल है। इसलिए जंतर-मंतर का सीजन-2 यदि सचमुच आता है, तो उसे यह तय करना होगा कि वह सिर्फ सरकार के खिलाफ आंदोलन है या व्यवस्था को बेहतर बनाने का आंदोलन। क्योंकि आंदोलन की सफलता भीड़ की संख्या से नहीं मापी जाती। वह इस बात से मापी जाती है कि आंदोलन खत्म होने के बाद कितने सवाल अनुत्तरित रह गए और कितने बदलाव जमीन पर दिखाई दिए। जंतर-मंतर पर फिर आवाज गूंजेगी। अब देखना यह है कि उस आवाज में सिर्फ विरोध होगा या भविष्य की कोई स्पष्ट तस्वीर भी।

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