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आमने-सामने सत्ता और विपक्ष

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संसद देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था है। यहां सवाल पूछे जाने चाहिए, जवाब दिए जाने चाहिए, बहस होनी चाहिए और उन सवालों का समाधान तलाशा जाना चाहिए जो देश के करोड़ों नागरिकों को प्रभावित करते हैं। लेकिन जब संसद परिसर ही सत्ता और विपक्ष के प्रदर्शन का अखाड़ा बन जाए तो सवाल केवल राजनीतिक टकराव का नहीं रहता, सवाल लोकतंत्र की प्राथमिकताओं का हो जाता है। छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष का आमने-सामने प्रदर्शन इसी बेचौनी की तस्वीर है। दोनों तरफ नारे हैं, आरोप हैं, पोस्टर हैं और अपनी-अपनी राजनीतिक व्याख्याएं हैं। सत्ता पक्ष कहता है कि विपक्ष छात्रों के मुद्दे पर राजनीति कर रहा है। विपक्ष कहता है कि सरकार छात्रों की आवाज दबा रही है। लेकिन इस शोर के बीच एक आवाज लगातार गायब हैकृछात्र की आवाज। जिस छात्र के नाम पर संसद में प्रदर्शन हो रहा है, उससे कोई पूछ रहा है कि वह चाहता क्या है? उसे न तो संसद के बाहर नेताओं की नारेबाजी चाहिए और न संसद के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप। उसे चाहिए एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था, जिस पर उसे भरोसा हो। उसे चाहिए कि उसकी मेहनत किसी लापरवाही, अनियमितता या व्यवस्था की कमजोरी के कारण बर्बाद न हो। उसे चाहिए कि यदि उसके साथ अन्याय हुआ है तो उसकी शिकायत सुनी जाए और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो। इतनी सी बात है। लेकिन राजनीति ने इस सीधी बात को भी इतना जटिल बना दिया है कि छात्र का मूल सवाल पीछे छूट गया है। भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की तैयारी होती है। गांव से शहर आने वाला छात्र, छोटे कमरे में रहकर पढ़ने वाला छात्र, खेत में काम करने के बाद किताब खोलने वाला छात्र, परिवार की आर्थिक मुश्किलों के बीच फीस जुटाने वाला छात्रकृहर किसी की अपनी कहानी है। वह केवल प्रश्नपत्र हल नहीं करता, वह अपने परिवार की उम्मीदें हल करता है और जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है तो चोट केवल एक परीक्षा पर नहीं होती। चोट उस भरोसे पर होती है जिसके सहारे युवा अपना भविष्य बना रहा होता है। यही कारण है कि छात्रों के सवाल को राजनीतिक नारे में बदल देना खतरनाक है। सरकार के लिए यह केवल विपक्ष का आंदोलन नहीं होना चाहिए। विपक्ष के लिए यह केवल सरकार को घेरने का अवसर नहीं होना चाहिए। दोनों को यह समझना होगा कि युवा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। वह देश की संपत्ति है। सरकार को यदि लगता है कि परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो उसे तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए। अगर कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसे स्वीकार करने में संकोच क्यों? गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। गलती छिपाना कमजोरी है। सरकार के पास संस्थाएं हैं, संसाधन हैं और निर्णय लेने की शक्ति है। इसलिए उससे सवाल भी ज्यादा होंगे। यह लोकतंत्र का सामान्य नियम है। यदि छात्र किसी परीक्षा को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो सरकार को उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। जांच की जरूरत है तो जांच हो। जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है तो जिम्मेदारी तय हो। परीक्षा प्रणाली में तकनीकी या प्रशासनिक कमी है तो सुधार हो। लेकिन यह भी जरूरी है कि जांच और सुधार केवल घोषणा बनकर न रह जाएं। युवा अब घोषणाओं से आगे की चीज मांगता हैकृविश्वास। लेकिन विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। हर छात्र आंदोलन को राजनीतिक आंदोलन बना देना आसान है। हर परीक्षा विवाद में सरकार के खिलाफ नारा लगाना भी आसान है। मुश्किल काम है समस्या का समाधान सामने रखना। अगर विपक्ष छात्रों के साथ है तो संसद में केवल हंगामा क्यों? विस्तृत बहस क्यों नहीं? परीक्षा सुधार की ठोस योजना क्यों नहीं? जिम्मेदार संस्थाओं की जवाबदेही तय करने का दबाव क्यों नहीं? सड़क पर प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन संसद में विपक्ष की असली ताकत उसके सवाल और तर्क हैं। संसद में आवाज ऊंची करने से ज्यादा जरूरी है सवाल को मजबूत करना। विपक्ष को यह समझना होगा कि छात्र उसके राजनीतिक पोस्टर का चेहरा नहीं बनना चाहता। वह चाहता है कि उसका भविष्य सुरक्षित हो। आज सबसे बड़ा सवाल संसद से है। क्या संसद छात्रों के मुद्दे पर गंभीर बहस करेगी? क्या सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने से आगे बढ़ेंगे? क्या परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कोई सर्वदलीय सहमति बनेगी? क्या यह तय होगा कि किसी परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत होने पर जांच और कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी? क्या विद्यार्थियों को समय पर जानकारी देने की जवाबदेही तय होगी? क्या परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही भी उतनी ही कठोर होगी जितनी किसी छात्र की होती है? क्योंकि छात्र से कहा जाता है कि समय पर आवेदन करो। समय पर फीस भरो। समय पर परीक्षा केंद्र पहुंचो। एक गलती हुई तो परिणाम भुगतो। तो फिर व्यवस्था से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि अगर उसकी गलती से लाखों छात्रों का समय और पैसा बर्बाद हो जाए तो जिम्मेदार कौन होगा? नियम केवल छात्रों के लिए क्यों? जवाबदेही व्यवस्था की भी होनी चाहिए। भारत की राजनीति में युवा हमेशा सबसे आकर्षक शब्द रहा है। हर चुनाव में युवा शक्ति की बात होती है। रोजगार के वादे होते हैं। स्टार्टअप की बातें होती हैं। नई शिक्षा व्यवस्था की बातें होती हैं। डिजिटल भारत और विकसित भारत की बातें होती हैं। लोकसभा के बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष का आमने-सामने प्रदर्शन देखकर शायद दोनों अपने-अपने समर्थकों को यह साबित कर रहे हों कि वह छात्रों के साथ हैं। लेकिन छात्र को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि कौन उसके साथ खड़ा है। उसे परिणाम चाहिए। अगर सरकार सच में छात्रों के साथ है तो वह उनके सवालों के जवाब दे। अगर विपक्ष सच में छात्रों के साथ है तो वह उनके सवालों को राजनीतिक शोर से निकालकर नीतिगत बहस में ले जाए। दोनों मिलकर परीक्षा व्यवस्था की ऐसी जवाबदेही तय करें कि आने वाली पीढ़ी को बार-बार सड़क पर उतरना न पड़े। यही राजनीति की परीक्षा है।

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