- चमोली जिले में तबाही के बीच अपनों की खोज
- कागजी दावों पर भारी पड़ रहा प्रकृति का गुस्सा
- जलसैलाब में पुल, वाहन बहे, एक कर्मी लापता
- सवाल राहत की तस्वीरें आ गई पर जवाब कब
देहरादून। चमोली में पानी आया और अपने साथ सिर्फ पुल और गाड़ियां नहीं ले गया। वह अपने साथ उन परिवारों की नींद भी बहा ले गया, जिनके अपने अचानक लापता हो गए। सड़क बनाने वाले, पुल खड़े करने वाले और सीमा तक पहुंच का रास्ता तैयार करने वाले बीआरओ के कर्मी भी इस जलसैलाब की चपेट में आ गए। पहाड़ में जब पानी अपना रास्ता बदलता है तो आदमी के बनाए रास्ते कितने कमजोर हैं, यह कुछ ही मिनटों में साफ हो जाता है। एक तरफ उफनता पानी था, दूसरी तरफ पहाड़। बीच में इंसान था, उसकी मशीनें थीं, सड़क थी और वह पुल था जिस पर भरोसा करके लोग इस दुर्गम इलाके में आवाजाही करते हैं। फिर पानी आया और पुल नहीं रहा। गाड़ियां नहीं रहीं। कुछ लोग लौटकर नहीं आए। अब प्रशासन खोज रहा है। टीमें लग रही हैं। राहत और बचाव का काम चल रहा है। तस्वीरें आएंगी। हेलीकाप्टर उड़ेंगे। अधिकारियों के बयान आएंगे। बताया जाएगा कि हालात पर नजर रखी जा रही है। लेकिन पहाड़ का सबसे बड़ा सवाल इन बयानों के बीच कहीं खो जाता है आखिर हर बार पहाड़ ही क्यों बताता है कि हमने तैयारी कितनी कम की थी?
चमोली कोई पहली बार बारिश देखने वाला इलाका नहीं है। यहां बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलसैलाब का खतरा नया नहीं है। फिर भी हर बड़ी घटना के बाद हमारी भाषा वही रहती है अचानक, अप्रत्याशित, प्राकृतिक आपदा। प्रकृति निश्चित रूप से अपने रास्ते में किसी की अनुमति नहीं लेती। लेकिन क्या खतरे का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता? यही वह सवाल है जिसे पूछना जरूरी है। एक पुल टूटता है तो प्रशासन के कागज पर वह एक ढांचा होता है। लेकिन गांव के आदमी के लिए पुल बाजार तक पहुंच है। स्कूल जाने का रास्ता है। अस्पताल जाने का रास्ता है। रोजगार तक पहुंच है और पहाड़ में कई बार पुल का मतलब दुनिया से जुड़ा रहना होता है। इसलिए जब जलसैलाब किसी पुल को बहा ले जाता है तो उसके साथ सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं जाती। लोगों का भरोसा भी टूटता है और जब उसी घटना में सड़क और सीमा से जुड़े काम में लगे कर्मी लापता हो जाएं, तब यह हादसा और भी गंभीर हो जाता है। उनके घरों में इस समय कोई सरकारी प्रेस नोट नहीं पढ़ा जा रहा होगा। वहां सिर्फ एक सवाल होगा कि वह वापस कब आएंगे?
हमारी आपदा पत्रकारिता की एक अजीब आदत है। पहले संख्या आती है। कितने पुल बहे? कितनी गाड़ियां बहीं? कितने लोग लापता? कितनी सड़कें बंद? फिर तस्वीरें आती हैं। फिर दौरा होता है। फिर समीक्षा बैठक होती है। फिर मुआवजे की घोषणा होती है। लेकिन कुछ दिनों बाद जब कैमरे दूसरी खबर की ओर चले जाते हैं, तब उन परिवारों का क्या होता है? जिस घर का आदमी वापस नहीं आया, वहां बारिश खत्म होने के बाद भी इंतजार खत्म नहीं होता। जिस सड़क का पुल बह गया, वहां मौसम साफ होने के बाद भी रास्ता नहीं बन जाता और जिस पहाड़ में एक हादसा हुआ, वहां अगली बारिश तक वही खतरा फिर खड़ा रहता है।
उत्तराखंड में विकास जरूरी है। सड़क चाहिए। पुल चाहिए। सुरंग चाहिए। सीमा तक बेहतर संपर्क चाहिए। गांवों को बाजार और अस्पताल से जोड़ना जरूरी है। लेकिन विकास का अर्थ पहाड़ की प्रकृति को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता। जब पहाड़ की ढलान, नदी का प्राकृतिक बहाव, जल निकासी और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करके निर्माण होता है, तब प्रकृति की पहली बड़ी परीक्षा में हमारी इंजीनियरिंग कटघरे में खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों बनाई गई। सवाल यह है कि सड़क कैसे बनाई गई? सवाल यह नहीं कि पुल क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि क्या पुल उस जलधारा और उस संभावित दबाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था? और सबसे बड़ा सवाल क्या हमने आपदा को केवल राहत और मुआवजे का विषय बना दिया है, जबकि उसे निर्माण और योजना का विषय होना चाहिए था?
बीआरओ कर्मियों की कहानी
सीमा से जुड़े इलाकों में काम करने वाले बीआरओ कर्मी अक्सर उस भारत की तस्वीर हैं जो नक्शे पर दिखाई नहीं देता, जहां सामान्य परिस्थितियों में पहुंचना मुश्किल है, वहां सड़क बनाना आसान काम नहीं। बारिश, बर्फ, भूस्खलन और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करने वाले इन लोगों के लिए पहाड़ रोज की चुनौती है। जलसैलाब में लापता कर्मियों की खबर इसलिए सिर्फ एक दुर्घटना की खबर नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो दूसरों के लिए रास्ते बनाते हैं और कभी-कभी उन्हीं रास्तों के बीच खुद रास्ता खो देते हैं। उनके परिवारों के सवालों का जवाब सिर्फ मुआवजे से नहीं दिया जा सकता। उन्हें जवाब चाहिए। खोज चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि अगर ऐसी परिस्थितियां दोबारा बनती हैं तो व्यवस्था पहले से तैयार होगी।
आपदा की तस्वीर
हर साल बारिश में उत्तराखंड की तस्वीरें देशभर में पहुंचती हैं। उफनती नदियां। टूटती सड़कें। भूस्खलन। फंसे यात्री। बचाव अभियान। हेलीकाप्टर और पहाड़ की गोद में खड़ा कोई आदमी, जो कैमरे के सामने कहता है साहब, रास्ता कब खुलेगा? फिर खबर खत्म। लेकिन पहाड़ की जिंदगी खबर खत्म होने के बाद शुरू होती है। चमोली के इस जलसैलाब के बाद भी यही होना चाहिए कि राहत और बचाव सबसे पहली प्राथमिकता बने। लापता लोगों की तलाश पूरी ताकत से हो। प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता मिले। लेकिन इसके बाद एक ईमानदार समीक्षा भी हो। क्यों पुल बहा? क्यों वाहन सुरक्षित नहीं रह सके? कहां चेतावनी व्यवस्था कमजोर थी? क्या निर्माण मानकों का पालन हुआ? क्या नदी और जलधाराओं के पुराने रास्तों का अध्ययन किया गया? क्या संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब अगर नहीं खोजे गए तो अगली बारिश फिर यही सवाल लेकर आएगी और तब शायद कोई दूसरा पुल होगा। कोई दूसरी गाड़ी होगी। कोई दूसरा परिवार इंतजार कर रहा होगा। पहाड़ को हर साल यह साबित करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि वह कितना खतरनाक हो सकता है। क्योंकि पहाड़ की त्रासदी सिर्फ पानी से नहीं आती। कई बार वह हमारी तैयारी की कमी से भी बड़ी हो जाती है।




