संसद के मानसून सत्र के अब केवल चार कार्य दिवस बचे हैं और सदन के भीतर कामकाज से ज्यादा शोर दिखाई दे रहा है। सरकार के पास महत्वपूर्ण विधेयकों की लंबी सूची है, विपक्ष के पास सवालों की लंबी फेहरिस्त है और जनता के पास यह देखने के अलावा फिलहाल कोई विकल्प नहीं कि उसके नाम पर चल रही संसद आखिर कितनी देर तक एक-दूसरे को सुनने के लिए तैयार होती है। महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए से जुड़े प्रस्ताव महज कुछ विधेयक नहीं हैं। इनका असर आने वाले वर्षों की राजनीति, प्रतिनिधित्व, चुनावी भूगोल और नागरिक समाज के कामकाज तक पड़ सकता है। ऐसे विषयों पर संसद में व्यापक बहस होनी चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि इन महत्वपूर्ण सवालों के बीच संसद स्वयं संवाद के संकट में फंसी हुई है। संसदीय गतिरोध कोई नई बात नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन मतभेद और गतिरोध में फर्क है। मतभेद लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, जबकि लगातार गतिरोध लोकतंत्र की संस्थागत क्षमता को कमजोर करता है। संसद का काम केवल विधेयक पारित करना नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और जनता की चिंताओं को आवाज देना भी है। इसीलिए सरकार का यह कहना कि गृह मंत्री अमित शाह छात्रों से जुड़े मुद्दे पर सदन में बयान देने को तैयार हैं, महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ यह शर्त जोड़ना कि विपक्ष बाधा उत्पन्न न करे, समाधान की दिशा में आधा कदम ही है। सरकार को बयान देना है तो उसे विपक्ष को सुनने की तैयारी भी दिखानी होगी। विपक्ष को सवाल पूछने हैं तो उसे सदन को चलने देने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। लोकतंत्र में संवाद कभी शर्तों पर नहीं चलता। संवाद की शुरुआत ही इस स्वीकार से होती है कि सामने वाला पक्ष भी अपनी बात रखने का अधिकार रखता है। छात्रों से जुड़े मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का अधिकार है। यदि पुलिस कार्रवाई या किसी प्रशासनिक निर्णय को लेकर सवाल उठे हैं तो उनका जवाब संसद में मिलना चाहिए। लेकिन उसी समय यह भी जरूरी है कि संसद को जवाब मांगने के मंच से जवाब सुनने के मंच में बदला जाए। यदि विपक्ष केवल नारे लगाए और सरकार केवल संख्याबल के भरोसे विधेयक पारित कराने की कोशिश करे, तो दोनों ही संसद की मूल भावना से दूर जा रहे होंगे। सबसे बड़ा सवाल महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर है। महिला आरक्षण का मुद्दा आधी आबादी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। परिसीमन देश के चुनावी नक्शे और प्रतिनिधित्व की संरचना को प्रभावित कर सकता है। ऐसे विषयों पर जल्दबाजी में राजनीतिक सहमति का दावा करना उतना ही गलत होगा, जितना अनिश्चितकाल तक चर्चा को रोक देना। परिसीमन का सवाल विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि इसमें राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व, जनसंख्या और संघीय संतुलन जैसे प्रश्न जुड़े हैं। दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को नजरअंदाज करके कोई भी बड़ा फैसला व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना टिकाऊ नहीं हो सकता। संसद बहुमत की ताकत से कानून तो बना सकती है, लेकिन लोकतंत्र में हर कानून की राजनीतिक वैधता केवल वोटों की संख्या से तय नहीं होती। इसी तरह एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों पर भी संसद में खुली बहस होनी चाहिए। विदेशी धन के दुरुपयोग पर निगरानी जरूरी है, लेकिन नागरिक समाज संगठनों की स्वतंत्रता और उनके वैध कामकाज को लेकर उठने वाली चिंताओं का जवाब भी सरकार को देना होगा। सुरक्षा और पारदर्शिता के नाम पर नियंत्रण बढ़ाना आसान है, चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे। विडंबना देखिए कि संसद के पास इन सभी सवालों पर चर्चा के लिए समय कम है और राजनीतिक अविश्वास बढ़ता जा रहा है। चार दिन में बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन तभी जब सरकार और विपक्ष दोनों यह समझें कि संसद चुनावी अखाड़ा नहीं, संवैधानिक संस्था है। सरकार को अपनी विधायी प्राथमिकताओं पर विपक्ष से बातचीत करनी चाहिए। विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि सदन को रोकना उसकी रणनीति का स्थायी विकल्प नहीं हो सकता। सरकार जवाब दे, विपक्ष सवाल पूछे और फिर सदन निर्णय करे यही संसदीय लोकतंत्र का सामान्य रास्ता है। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि कौन संसद में ज्यादा देर तक नारे लगाता है। जरूरत इस बात की है कि कौन जनता के सवालों को ज्यादा देर तक संसद के भीतर जिंदा रखता है। मानसून सत्र के यह आखिरी चार दिन इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके सामने केवल कुछ विधेयकों का भविष्य नहीं है। इनके सामने संसद की कार्यसंस्कृति का सवाल भी है। क्या सत्ता पक्ष बहुमत को संवाद का विकल्प मानेगा? क्या विपक्ष विरोध को सदन चलने देने की जिम्मेदारी के साथ संतुलित करेगा? और क्या सरकार ऐसे संवेदनशील संवैधानिक मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे। संसद की गरिमा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। सरकार आज सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकती है। विपक्ष आज विरोध में है, कल सत्ता में आ सकता है। लेकिन संसद और लोकतंत्र दोनों इन दलों से बड़े हैं। इसलिए आखिरी चार दिनों में सबसे जरूरी विधेयक शायद कोई विधेयक नहीं, बल्कि संवाद की वह परंपरा है जिसे बचाए बिना कोई भी कानून लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकता। संसद चलेगी तो बहस होगी। बहस होगी तो असहमति होगी। असहमति होगी तो रास्ता निकलेगा। संसद का रुकना किसी की जीत नहीं हैकृयह लोकतंत्र की हार है।




