- यशपाल आर्य को सीएम फेस बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी
- सत्ता की लड़ाई में कांग्रेस का नया कार्ड, हाईकमान की मुहर का इंतजार
- कांग्रेस की तराई से पहाड़ तक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब तेज होती जा रही है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस अब ऐसा चेहरा तलाश रही है जो भाजपा के चुनावी नैरेटिव को सीधे चुनौती दे सके। पार्टी के भीतर से निकल रही चर्चाओं और सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह रणनीति अंतिम रूप लेती है तो उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। कांग्रेस पहली बार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे को स्पष्ट कर भाजपा के सामने सीधी राजनीतिक लड़ाई खड़ी कर सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान को करना है।
कांग्रेस की रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने एक ऐसा चेहरा खड़ा करना है, जिसके पास लंबा राजनीतिक अनुभव हो और जो प्रदेश के अलग-अलग सामाजिक समीकरणों में स्वीकार्यता रखता हो। यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं। इसके अलावा उनकी राजनीतिक पकड़ कुमाऊं के साथ-साथ तराई क्षेत्र में भी मानी जाती है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर पेश करने से चुनाव का विमर्श केवल धामी बनाम कौन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दे भी केंद्र में आ सकते हैं।
आर्य को आगे करने की चर्चा के पीछे सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तराखंड में दलित मतदाता चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस अगर आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे करती है तो पार्टी इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के बड़े संदेश के रूप में पेश कर सकती है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि भाजपा पिछले दो विधानसभा चुनावों से लगातार मजबूत स्थिति में है। ऐसे में केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे सत्ता में वापसी मुश्किल हो सकती है। पार्टी को ऐसा नैरेटिव तैयार करना होगा जो मतदाताओं को यह भरोसा दिला सके कि उसके पास सरकार चलाने का स्पष्ट नेतृत्व और रोडमैप दोनों मौजूद हैं। यहीं पर आर्य का नाम कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
आर्य को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करना कांग्रेस के लिए जितना बड़ा राजनीतिक दांव होगा, उतनी ही बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर पैदा हो सकती है। उत्तराखंड कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार माने जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विधायक और संगठन के कई प्रभावशाली चेहरे लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में किसी एक चेहरे को चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बाद बाकी नेताओं को साथ लेकर चलना कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। कांग्रेस अगर आर्य के नाम पर आगे बढ़ती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी का चुनावी अभियान किसी एक नेता की महत्वाकांक्षा के बजाय सामूहिक नेतृत्व के संदेश के साथ आगे बढ़े।
भाजपा की रणनीति फिलहाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की है। पार्टी संगठन बूथ स्तर तक अपनी तैयारियां तेज कर चुका है। ऐसे में कांग्रेस अगर आर्य को सामने रखती है तो मुकाबला सीधे दो राजनीतिक चेहरों के बीच दिखाई देने लगेगा। धामी की सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा छवि और भाजपा संगठन का मजबूत नेटवर्क है। वहीं आर्य के पक्ष में लंबा प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव तथा विभिन्न सामाजिक समूहों में उनकी पहचान को रखा जा सकता है। यानी कांग्रेस की रणनीति सफल हुई तो 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि धामी बनाम आर्य की राजनीतिक लड़ाई के रूप में भी पेश हो सकता है।
यशपाल आर्य को आगे करने का एक और राजनीतिक संदेश क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं और गढ़वाल के बीच नेतृत्व के संतुलन का सवाल हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। आर्य के चेहरे के साथ कांग्रेस तराई और कुमाऊं के मतदाताओं को साधने की कोशिश कर सकती है। साथ ही पहाड़ में पार्टी के पुराने जनाधार को वापस खड़ा करने के लिए अलग रणनीति अपनाई जा सकती है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को वह अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। पार्टी का संदेश हो सकता है कि भाजपा को लगातार दो कार्यकाल देने के बाद अब मतदाता बदलाव की ओर देख रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान वास्तव में यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में घोषित करेगा? सूत्रों की चर्चा को अगर राजनीतिक संकेत मानें तो कांग्रेस नेतृत्व उत्तराखंड के चुनाव को इस बार अधिक स्पष्ट नेतृत्व के साथ लड़ने की तैयारी में है। लेकिन पार्टी के भीतर की खींचतान और टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व के सवाल तक कई ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर अंतिम फैसला आसान नहीं होगा। कांग्रेस यदि आर्य को आगे करती है तो यह केवल एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना नहीं होगा। यह उत्तराखंड की जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक गणित को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिश होगी।
आखिरकार चुनाव केवल चेहरों से नहीं जीते जाते। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, आपदा, महंगाई, भ्रष्टाचार, चारधाम यात्रा और पहाड़ की बुनियादी जरूरतें भी मतदाता के सामने होंगी। भाजपा अपने विकास माडल और धामी सरकार के कामकाज को लेकर मैदान में उतरेगी। कांग्रेस को जवाब में केवल चेहरे की राजनीति नहीं, बल्कि एक स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा भी देना होगा। अगर कांग्रेस आर्य को सामने रखती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि चेहरा आकर्षण बने, बोझ नहीं। फिलहाल यशपाल आर्य का नाम कांग्रेस की संभावित रणनीति में तेजी से उभर रहा है। लेकिन राजनीति में सूत्रों की चर्चा और आधिकारिक फैसला दो अलग चीजें हैं। इसलिए असली तस्वीर कांग्रेस हाईकमान के निर्णय के बाद ही साफ होगी। फिर भी इतना तय है कि अगर कांग्रेस ने आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर मैदान में उतारने का फैसला कर लिया, तो उत्तराखंड का 2027 चुनाव अब तक के सबसे दिलचस्प राजनीतिक मुकाबलों में शामिल हो सकता है।




