नीट यूजी सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों परिवारों के सपनों की वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर एक बच्चा डाक्टर बनने का सपना देखता है। लेकिन जब इसी परीक्षा की गोपनीयता के भीतर से कोई विभीषण व्यवस्था को धोखा देता है, तो सवाल सिर्फ पेपर लीक का नहीं रहता सवाल भरोसे के लीक होने का हो जाता है। हर साल लाखों बच्चे नीट यूजी की तैयारी करते हैं। कोई छोटे शहर से आता है, कोई गांव से, कोई साधारण परिवार से। किसी के पास महंगे कोचिंग संस्थान हैं तो कोई किताबों और आनलाइन सामग्री के सहारे तैयारी करता है। महीनों नहीं, कई बार वर्षों तक एक बच्चा अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य एक परीक्षा के सामने रख देता है। फिर परीक्षा का दिन आता है। बच्चा परीक्षा केंद्र पहुंचता है। जेब में एडमिट कार्ड होता है और आंखों में डाक्टर बनने का सपना। लेकिन अगर उसी समय किसी दूसरे कमरे में बैठा कोई व्यक्ति पहले से प्रश्नपत्र और उसके जवाबों तक पहुंच बना चुका हो, तो उस बच्चे की मेहनत का क्या अर्थ रह जाता है? यहीं से नीट यूजी पेपर लीक की कहानी सिर्फ अपराध की कहानी नहीं रहती। यह मेहनत बनाम पहुंच, ईमानदारी बनाम जुगाड़ और प्रतिभा बनाम व्यवस्था के भीतर बैठे बिचौलियों की कहानी बन जाती है। रामायण में विभीषण लंका के भीतर का व्यक्ति था। आज के संदर्भ में विभीषण शब्द किसी समुदाय या व्यक्ति के लिए आरोप की तरह इस्तेमाल करने के बजाय उस भीतरी तंत्र का रूपक है, जहां से गोपनीय जानकारी बाहर निकलती है। प्रश्नपत्र आसमान से नहीं गिरता। उसकी छपाई होती है। उसकी पैकिंग होती है। उसकी ढुलाई होती है। उसकी सुरक्षा होती है। परीक्षा केंद्र तक वह पहुंचता है। इस पूरी प्रक्रिया में जितने हाथ और संस्थान जुड़े हैं, वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। इसलिए हर बार जब पेपर लीक होता है तो केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि प्रश्नपत्र किसने बेचा। सवाल यह भी होना चाहिए कि वह प्रश्नपत्र उस व्यक्ति तक पहुंचा कैसे? कौन-सी सुरक्षा परत टूटी? किसने नियमों को नजरअंदाज किया? किसने सूचना छिपाई? किसने पैसे लिए? और सबसे महत्वपूर्ण क्या व्यवस्था ने पहले से मौजूद कमजोरियों को जानने के बावजूद उन्हें दूर नहीं किया? पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान उस बच्चे का होता है, जिसने शायद एक साल अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य को दिया था। लेकिन नुकसान यहीं खत्म नहीं होता। उसके माता-पिता का भरोसा टूटता है। कोचिंग व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। परीक्षा संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और अंततः समाज के मन में यह धारणा मजबूत होती है कि सफलता मेहनत से नहीं, सिस्टम तक पहुंच से मिलती है। यह धारणा किसी भी देश के लिए खतरनाक है। क्योंकि डाक्टर बनने वाला छात्र सिर्फ परीक्षा पास नहीं कर रहा होता। वह भविष्य में किसी मरीज की जिंदगी संभालने जा रहा होता है। अगर मेडिकल शिक्षा में प्रवेश की पहली सीढ़ी ही भ्रष्टाचार से दूषित हो जाए तो सवाल केवल परीक्षा का नहीं, भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था के भरोसे का भी है। पेपर लीक के बाद अक्सर जांच होती है। एफआईआर होती है। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट होती है। राजनीतिक बयान आते हैं। लेकिन जनता को इससे आगे का जवाब चाहिए और उसे हमेशा के लिए बंद कैसे किया जाएगा? किसी एक आरोपी को पकड़ लेना समाधान नहीं है। अगर एक नेटवर्क में दस लोग हैं और उनमें से एक पकड़ा गया, तो बाकी नौ की भूमिका का क्या? अगर किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता किस आधार पर मांगी जा रही है? यह सवाल किसी एक सरकार, पार्टी या संस्था के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था के पक्ष में है जिसमें ईमानदारी से परीक्षा देने वाला बच्चा मूर्ख साबित न हो। नीट जैसी परीक्षा के लिए सुरक्षा व्यवस्था वैसी ही गंभीर होनी चाहिए जैसी किसी अत्यंत संवेदनशील राष्ट्रीय प्रक्रिया की होती है। पेपर की छपाई से लेकर परीक्षा केंद्र तक हर स्तर पर डिजिटल और भौतिक निगरानी, सीमित पहुंच, स्पष्ट जवाबदेही और स्वतंत्र आडिट जरूरी हैं। जिस स्तर पर लापरवाही हुई हो, उस स्तर के अधिकारी या संस्था की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और सबसे जरूरी जांच की प्रक्रिया पारदर्शी हो। क्योंकि जब परीक्षा में पारदर्शिता नहीं होगी तो जांच में पारदर्शिता की उम्मीद भी कमजोर पड़ जाएगी। भारत में प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती। यह सामाजिक गतिशीलता का माध्यम है। एक गरीब परिवार का बच्चा डाक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या शिक्षक बनकर अपने परिवार की दिशा बदल सकता है। उस बच्चे के पास शायद पैसा नहीं होता, राजनीतिक पहचान नहीं होती, प्रभावशाली रिश्ते नहीं होते। उसके पास सिर्फ एक चीज होती है मेहनत और अगर पेपर लीक जैसी घटनाएं उसे यह संदेश दें कि मेहनत से पहले किसी नेटवर्क की जरूरत है, तो हम सिर्फ एक परीक्षा नहीं खराब कर रहे। हम एक पीढ़ी के विश्वास को कमजोर कर रहे हैं। हर पेपर लीक के बाद किसी एक ‘विभीषण’ को ढूंढ लेना आसान है। मुश्किल काम है उस पूरी व्यवस्था को बदलना, जिसमें किसी एक व्यक्ति को भीतर से दरवाजा खोलने का मौका मिलता है। इसलिए नीट यूजी पेपर लीक का समाधान सिर्फ आरोपी पकड़ना नहीं है। समाधान है ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें पेपर लीक करना लगभग असंभव हो। ऐसी व्यवस्था जिसमें परीक्षा से पहले किसी को प्रश्नपत्र की जानकारी मिले तो तुरंत अलर्ट हो। ऐसी व्यवस्था जिसमें लापरवाही करने वाला अधिकारी भी उतना ही जवाबदेह हो जितना पेपर बेचने वाला और ऐसी व्यवस्था जिसमें लाखों विद्यार्थियों को यह भरोसा हो कि परीक्षा हाल में बैठते समय उनकी बराबरी किसी पैसे वाले या प्रभावशाली उम्मीदवार से कम नहीं है।




