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कैमरे चालू, ट्रक मुस्तैद और तमाशा

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  • अतिक्रमण हटाओ अभियान सहूलियत या सिर्फ कैमरों वाला छलावा
  • अवैध कब्जे से ज्यादा प्रशासनिक नूराकुश्ती से लाचार हुआ देहरादून
  • जब तक अफसर मेहरबान रहेंगे, तब तक कैसे खाली होंगे फुटपाथ
  • राजधानी दून में फुटपाथ पर कब्जे की वापसी हर बार होता है तेज

देहरादून। देहरादून में फिर अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है। फुटपाथ खाली कराए जा रहे हैं। दुकानों के बाहर रखा सामान ट्रकों में भरा जा रहा है। नगर निगम के अधिकारी कैमरों के सामने खड़े होकर बता रहे हैं कि शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाया जा रहा है। कुछ दिन तक सड़कें चौड़ी दिखाई देंगी। लोग कहेंगे, वाह, अब ट्रैफिक सुधर जाएगा। लेकिन जरा ठहरिए…एक महीना बाद उसी सड़क से गुजरिए। वही फुटपाथ फिर सामान से भर जाएंगे। वही ठेले, वही बोर्ड, वही टीन शेड, वही पार्किंग और वही कब्जा। फिर अगले साल यही अभियान चलेगा। फिर वही तस्वीरें, वही प्रेस विज्ञप्ति और वही दावा अतिक्रमण हटा दिया गया। सवाल यह नहीं है कि अतिक्रमण हटाया गया या नहीं। सवाल यह है कि अतिक्रमण हटता क्यों नहीं, सिर्फ हटाया क्यों जाता है? यानी बीमारी का इलाज नहीं, केवल बुखार नापने की रस्म निभाई जा रही है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या फुटपाथ पर बैठा छोटा दुकानदार?क्या फल बेचने वाला गरीब? क्या ठेले वाला? या फिर वह पूरा तंत्र जो सालों तक अवैध कब्जे को बढ़ने देता है और फिर अचानक बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है? अगर किसी दुकान ने दो-दो, तीन-तीन फुट तक सरकारी जमीन घेर ली, तो यह एक दिन में नहीं हुआ होगा। यह महीनों और वर्षों में हुआ होगा। तब नगर निगम कहां था? तब नोटिस क्यों नहीं दिए गए?तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?और अगर कार्रवाई हुई थी तो फिर कब्जा दोबारा कैसे हो गया? यानी शहर में अतिक्रमण से बड़ा सवाल प्रशासनिक अतिक्रमण का है। जहां जिम्मेदारी पर लापरवाही ने कब्जा कर लिया है।
अब देहरादून में अतिक्रमण हटाओ अभियान भी एक सरकारी मौसम बन चुका है।जैसे बरसात आती है। जैसे सर्दियां आती हैं। वैसे ही बुलडोजर भी आता है। मीडिया कवरेज होती है। कुछ तस्वीरें वायरल होती हैं। कुछ अधिकारी सम्मानित हो जाते हैं। फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगर अभियान के बाद दोबारा कब्जा हो जाता है, तो इसका मतलब साफ है कि कार्रवाई अधूरी थी। यही सबसे बड़ा सवाल है। जब फुटपाथ पर ठेला लगता है, तो बुलडोजर तुरंत पहुंच जाता है। लेकिन जब किसी बड़े होटल का पार्किंग क्षेत्र सड़क तक फैल जाता है…जब किसी बड़े शोरूम की सीढ़ियां सरकारी जमीन पर बन जाती हैं..जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बाउंड्री वाल आगे बढ़ जाती है…तब कार्रवाई की गति धीमी क्यों पड़ जाती है? कानून की आंख पर पट्टी इसलिए बांधी गई थी कि वह सबको बराबर देखे। लेकिन कई बार लगता है कि उस पट्टी के नीचे से पहचान भी झांक रही है।
यह यक्ष प्रश्न है कि फुटपाथ दुकानों के विस्तार के लिए नहीं बने।फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए बने हैं।लेकिन देहरादून में कई जगह पैदल चलना ही सबसे मुश्किल काम है।क्योंकि फुटपाथ पर दुकान है। ठेला है। बाइक खड़ी है। कार पार्क है और जहां कुछ नहीं है, वहां निर्माण सामग्री रखी है। यानी पैदल चलने वाला नागरिक सड़क पर उतरता है। फिर सड़क पर ट्रैफिक बढ़ता है। फिर दुर्घटना होती है। फिर प्रशासन ट्रैफिक प्लान बनाता है। लेकिन फुटपाथ वापस पैदल यात्रियों को नहीं मिलते।
कोई भी अवैध निर्माण बिना किसी की नजर के वर्षों तक खड़ा नहीं रह सकता। हर नया शेड…हर नया बोर्ड…हर नई दीवार…किसी न किसी की आंखों के सामने बनी होगी। अगर अधिकारी नहीं देख पाए, तो यह अक्षमता है। अगर देखकर भी नहीं बोले, तो यह सवाल जवाबदेही का है और अगर सब जानते थे, फिर भी चुप रहे, तो यह केवल अतिक्रमण नहीं, व्यवस्था की साझेदारी है। बुलडोजर समाधान नहीं है। समाधान है दोबारा कब्जा करने वालों पर भारी आर्थिक दंड, संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, हर अतिक्रमण क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग हो, साप्ताहिक निरीक्षण अनिवार्य हो, प्रभावशाली और सामान्य नागरिक के लिए समान कानून लागू हो, रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए नियोजित वेंडिंग ज़ोन विकसित किए जाएं, ताकि रोजगार भी बचे और सड़कें भी। जब तक कब्जा करने वाले से ज्यादा डर कार्रवाई करने वाले को रहेगा, तब तक अतिक्रमण लौटता रहेगा।
बता दें कि देहरादून केवल राजधानी नहीं है, यह उत्तराखंड का चेहरा है। लेकिन शहर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां अतिक्रमण हटाने का अभियान, अतिक्रमण रोकने की नीति से ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। बुलडोजर की आवाज कुछ घंटों तक सुनाई देती है। लेकिन उसके बाद फिर धीरे-धीरे दुकानें बाहर आने लगती हैं। सामान फुटपाथ पर सजने लगता है। लोहे के स्टैंड वापस आ जाते हैं। तिरपाल फिर तन जाती है और शहर समझ जाता है कि अभियान खत्म हो गया है। शायद देहरादून को बुलडोजर से ज्यादा ईमानदार निगरानी की जरूरत है। क्योंकि सवाल अतिक्रमण का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हर साल वही गलती दोहराती है और फिर उसी गलती पर कार्रवाई करके अपनी पीठ थपथपाती है और तब लगता है कि देहरादून में सड़कों पर सबसे स्थायी चीज अतिक्रमण नहीं, बल्कि अस्थायी कार्रवाई है। यही इस शहर की सबसे बड़ी विडंबना है।

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