- पेपर लीक पर देशभर में उबाल बरकरार, सरकार ने की सख्त कार्रवाई की बात
- विपक्ष सरकार को घेर रहा, सवाल अब भी वही है युवाओं का भरोसा लौटेगा
- सिस्टम का प्रश्नपत्र, युवाओं के सवाल, राजनीति के शोर में दबी वह आवाज
नई दिल्ली। देश के अलग-अलग शहरों में एक जैसा दृश्य दिखाई दे रहा है। कहीं छात्र हाथों में तख्तियां लिए खड़े हैं, कहीं सड़कों पर मार्च निकाल रहे हैं, कहीं धरना दे रहे हैं। वह किसी एक राज्य के छात्र नहीं हैं। उनकी भाषा अलग हो सकती है, लेकिन उनका प्रश्न एक है क्या मेहनत का कोई मूल्य बचा है? पेपर लीक का मामला अब किसी एक भर्ती परीक्षा का विवाद नहीं रह गया है। यह उस पीढ़ी की बेचौनी बन चुका है, जिसने बचपन से यही सुना कि पढ़-लिख लो, जिंदगी बदल जाएगी। अब वही पीढ़ी पूछ रही है कि अगर प्रश्नपत्र पहले ही बिक जाएगा, तो पढ़ाई किसके लिए करें? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के खिलाफ और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। सरकार कह रही है कि माफिया के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे कम सुनी जा रही आवाज उसी युवा की है, जिसके लिए यह पूरा विवाद खड़ा हुआ है।
पेपर लीक की हर घटना के बाद एक तयशुदा क्रम दिखाई देता है। सरकार जांच की घोषणा करती है। विपक्ष प्रेस कान्फ्रेंस करता है। सोशल मीडिया पर हैशटैग चलने लगते हैं। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। फिर कुछ दिन बाद एक नया मामला सामने आ जाता है। इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि युवाओं का धैर्य पहले जैसा नहीं रहा। व केवल बयान नहीं सुनना चाहते। उन्हें परिणाम चाहिए। उनके लिए यह कोई टीवी डिबेट नहीं है। यह उनकी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण समय है। एक भर्ती परीक्षा रद्द होने का मतलब सिर्फ नई तारीख नहीं होता। इसका मतलब है एक और साल की तैयारी, एक और साल का खर्च, परिवार पर बढ़ता आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव।
सरकार से सवाल है कि यदि पेपर लीक पर पहले भी कानून बने, एजेंसियां सक्रिय हुईं और गिरफ्तारियां हुईं, तो फिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों सामने आती हैं? लेकिन विपक्ष से भी सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब वह सत्ता में था, तब क्या परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष थी? क्या आज का आक्रोश केवल सरकार बदलने का मुद्दा है या व्यवस्था बदलने का? युवा शायद इस राजनीतिक हिसाब-किताब में दिलचस्पी नहीं रखता। उसे इससे फर्क नहीं पड़ता कि प्रेस कान्फ्रेंस कौन कर रहा है। उसे फर्क इससे पड़ता है कि अगली परीक्षा समय पर होगी या नहीं।
यह समझना होगा कि आज का प्रदर्शन केवल पेपर लीक के खिलाफ नहीं है। यह रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग भी है। देश का बड़ा युवा वर्ग वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। कई अभ्यर्थी उम्र सीमा के अंतिम पड़ाव पर हैं। कई परिवार अपनी बचत कोचिंग और रहने-खाने पर खर्च कर चुके हैं। जब ऐसी स्थिति में परीक्षा रद्द होती है या पेपर लीक की खबर आती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती। यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन जाती है। लोकतंत्र में जनता सरकार से असहमत हो सकती है, लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब जनता व्यवस्था पर ही विश्वास खोने लगे। आज कई युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है। उन्हें लगने लगा है कि मेहनत और मेरिट से ज्यादा ताकत संगठित गिरोहों की हो गई है। यदि यह भावना गहरी होती गई, तो नुकसान केवल एक सरकार का नहीं होगा। नुकसान उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा, जो समान अवसर देने का दावा करती है।
यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन हिंसा उसका विकल्प नहीं हो सकती। यदि किसी आंदोलन की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, पुलिस पर हमला होता है या अराजकता फैलाने की कोशिश होती है, तो कानून को निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार न हो। लोकतंत्र में डंडा और संवाद दोनों का अपना स्थान है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कौन आता है।
आने वाले चुनावों में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे युवाओं के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। कभी जाति चुनाव का केंद्र होती थी, कभी धर्म। अब रोजगार और परीक्षा प्रणाली भी उसी सूची में शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। सरकार के लिए यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। विपक्ष के लिए भी यह अवसर तभी है, जब वह केवल आरोप लगाने के बजाय ठोस वैकल्पिक व्यवस्था का खाका पेश करे।
इस समय देश की सड़कों पर जो भीड़ दिखाई दे रही है, उसे केवल प्रदर्शनकारी भीड़ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उस भीड़ में कोई किसान का बेटा है, कोई रिक्शा चालक की बेटी, कोई पहाड़ के गांव से आया छात्र, कोई छोटे कस्बे का अभ्यर्थी। वह सरकार बदलने नहीं निकले हैं। वह अपना भविष्य बचाने निकले हैं और लोकतंत्र में जब युवा अपने भविष्य की सुरक्षा मांगने के लिए सड़कों पर उतर आए, तब सबसे पहले राजनीतिक दलों को अपनी आवाज धीमी कर देनी चाहिए और युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। क्योंकि चुनाव पांच साल में एक बार आते हैं, लेकिन युवाओं की उम्र दोबारा नहीं आती।




