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भाजपा का ‘ब्रह्मास्त्र’ बनेगा कार्यकर्ता

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  • सत्ता विरोधी माहौल की आशंकाओं के बीच बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने की कवायद तेज
  • गांव-गांव में सक्रिय किए जा रहे भाजपा के जमीन से जुड़े पुराने सभी कार्यकर्ता
  • संगठन के दरवाजे पर इंतजार करने वाले कार्यकर्ता बनेंगे चुनावी वैतरणी पार कराने वाले

देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट ने भाजपा के भीतर संगठनात्मक समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं। सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली नेताओं, मंत्रियों और पदाधिकारियों के बीच खड़ा वह साधारण कार्यकर्ता, जो पिछले कुछ वर्षों में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था, अचानक भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बन गया है। पार्टी नेतृत्व अब गांव-गांव और घर-घर तक पहुंच रखने वाले कार्यकर्ताओं को चुनावी रणनीति का केंद्र बना रहा है।
भाजपा अच्छी तरह समझती है कि चुनावी जीत केवल सरकारी योजनाओं, बड़े नेताओं की सभाओं और सोशल मीडिया अभियानों से सुनिश्चित नहीं होती। बूथ पर बैठा कार्यकर्ता ही वह कड़ी है जो मतदाता और पार्टी के बीच सीधा संवाद स्थापित करता है। यही कारण है कि संगठन अब बूथ समितियों को सक्रिय करने, पन्ना प्रमुखों को मजबूत करने और पुराने कार्यकर्ताओं को फिर से मैदान में उतारने की कवायद में जुट गया है।
दरअसल, सत्ता के दस वर्षों के दौरान पार्टी के भीतर एक धारणा बनी कि कुछ चुनिंदा नेताओं और पदाधिकारियों तक ही संगठन सीमित हो गया है। कई पुराने कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक और निजी तौर पर यह शिकायत भी की कि उन्हें न तो संगठन में पर्याप्त महत्व मिला और न ही सरकार में उनकी सुनवाई हुई। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, पार्टी को एहसास हो रहा है कि चुनावी जंग एयरकंडीशंड कमरों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों, कस्बों की गलियों और बूथों पर लड़ी जाती है।
भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने हाल के दिनों में लगातार संगठनात्मक बैठकों का सिलसिला तेज किया है। मंत्रियों, विधायकों और जिलाध्यक्षों को स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि बूथ स्तर तक संवाद बढ़ाया जाए। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि विपक्ष के आरोपों, स्थानीय नाराजगियों और सरकार विरोधी माहौल को निष्प्रभावी करने का काम केवल वही कार्यकर्ता कर सकता है जो रोज जनता के बीच रहता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका कैडर आधारित ढांचा रहा है। 2017 और 2022 के चुनावों में भी बूथ प्रबंधन ने पार्टी को बड़ी सफलता दिलाई थी। लेकिन इस बार चुनौती अलग है। एक ओर सत्ता विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करना है तो दूसरी ओर संगठन के भीतर नाराज कार्यकर्ताओं को भी साथ लेकर चलना है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व छोटे कार्यकर्ता को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जिन कार्यकर्ताओं को कभी नेताओं के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने तक सीमित समझा जाता था, आज वही कार्यकर्ता चुनावी गणित के सबसे अहम सूत्रधार बन गए हैं। गांवों में होने वाली बैठकों से लेकर सोशल मीडिया के स्थानीय नेटवर्क तक, हर जगह कार्यकर्ता की भूमिका बढ़ी है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी भाजपा की इस रणनीति पर नजर बनाए हुए हैं। विपक्ष का दावा है कि चुनाव आते ही भाजपा को कार्यकर्ताओं की याद आ जाती है, जबकि सत्ता के दौरान उनकी उपेक्षा की जाती है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि संगठन की असली ताकत हमेशा कार्यकर्ता ही रहा है और रहेगा।
फिलहाल इतना तय है कि 2027 की चुनावी रणभेरी बजने से पहले भाजपा में सबसे अधिक पूछ-परख किसी मंत्री, विधायक या पदाधिकारी की नहीं, बल्कि उस कार्यकर्ता की हो रही है जो हर चुनाव में पार्टी का झंडा लेकर सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है। सत्ता की राजनीति में भले चेहरे बदलते रहें, लेकिन चुनाव आते ही भाजपा को फिर याद आ जाता है कि उसकी असली ताकत बूथ का कार्यकर्ता ही है। आज की स्थिति में कहा जाए तो भाजपा में छोटा कार्यकर्ता ही सबसे बड़ा भगवान बन गया है।

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