- विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा
- उत्तराखंड चुनाव 2027 है सत्ता से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई
- भाजपा बचाएगी साख, कांग्रेस तलाशेगी वापसी का रास्ता
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए नाक और साख का सवाल बनता जा रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटकर नया राजनीतिक इतिहास रचने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस एक दशक से चले आ रहे सत्ता के सूखे को समाप्त कर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की चुनौती से जूझ रही है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे साफ है कि दोनों दल इस मुकाबले को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रहे हैं। प्रदेश से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
उत्तराखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि प्रदेश में हर चुनाव में सरकार बदलती है। लेकिन 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। अब भाजपा की नजर तीसरी बार सत्ता हासिल करने पर है। यदि पार्टी ऐसा करने में सफल रहती है तो यह उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय होगा। मुख्यमंत्री, सरकार और संगठन सभी चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जा रहा है। भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लगातार तीसरी जीत पार्टी की नीतियों, संगठन और नेतृत्व पर जनता की मुहर मानी जाएगी।
दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अस्तित्व और साख की चुनौती है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी लगातार सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि अपनी प्रासंगिकता साबित करने का अवसर भी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भर्ती घोटाले, भू-कानून और क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे वह जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। पार्टी नेतृत्व लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और संगठन को नई ऊर्जा देने में जुटा है। यदि कांग्रेस इस चुनाव में भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाती है तो पार्टी के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहा है।
उत्तराखंड का चुनाव केवल प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की नजर भी इस चुनाव पर है। भाजपा के लिए यह प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व की लोकप्रियता को बरकरार रखने की परीक्षा होगी, जबकि कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुनरुत्थान की रणनीति को मजबूती देने का अवसर। इसी कारण दोनों दलों के राष्ट्रीय नेता लगातार उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों में दिल्ली की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता की संयुक्त परीक्षा होगा। भाजपा जहां अपने विकास कार्यों और योजनाओं के आधार पर जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए सत्ता बचाना और कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटना केवल चुनावी लक्ष्य नहीं, बल्कि नाक और साख का सवाल बन गया है।




