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भाजपा: सत्ता-संगठन में ‘परफेक्ट ट्यूनिंग’

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  • रूठे नेताओं को मनाकर भीतरघात का खतरा टालने की कोशिश
  • कमजोर कड़ियों को मजबूत कर क्लीन स्वीप की चल रही तैयारी
  • चुनावी शंखनाद से पहले कुनबे को एक रखने की कवायद शुरू

देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही भाजपा ने संगठन और सत्ता के बीच समन्वय मजबूत करने के साथ-साथ नाराज नेताओं को साधने की कवायद भी तेज कर दी है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन को मजबूत करने, हारी हुई सीटों पर विशेष फोकस करने और कार्यकर्ताओं व नेताओं को एकजुट रखने पर जोर दे रहा है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन भाजपा ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। पार्टी नेतृत्व को यह एहसास है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का रास्ता केवल सरकारी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता से होकर गुजरता है। यही वजह है कि भाजपा के बड़े नेता अब उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने में जुट गए हैं जो पिछले कुछ वर्षों में टिकट, दायित्व या संगठनात्मक उपेक्षा को लेकर नाराज रहे हैं। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन विधानसभा क्षेत्रों की है जहां 2022 के चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था या जीत का अंतर बेहद कम रहा था। पार्टी नेतृत्व इन सीटों पर विशेष रणनीति बना रहा है और सांसदों, विधायकों तथा वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंप रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की अंदरूनी नाराजगी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। यही कारण है कि संगठन स्तर पर ऐसे नेताओं से संवाद बढ़ाया जा रहा है जो पिछले चुनावों के बाद खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे थे। कई वरिष्ठ नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देकर कार्यकर्ताओं में संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि पार्टी सभी को साथ लेकर चलना चाहती है।
भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी हालिया बैठकों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया है। पार्टी सांसदों और विधायकों को निर्देश दिए गए हैं कि वह अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली लोगों, सामाजिक संगठनों और पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाएं। इसके पीछे मकसद चुनावी माहौल बनने से पहले संगठन को पूरी तरह सक्रिय करना है। दूसरी ओर टिकट की दावेदारी को लेकर भी भाजपा सतर्क दिखाई दे रही है। प्रदेश नेतृत्व पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उम्मीदवार चयन का आधार केवल जीतने की क्षमता होगी और इसके लिए कई स्तरों पर सर्वे कराए जाएंगे। ऐसे में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं को अभी से अनुशासन में रहने का संदेश दिया जा रहा है।
भाजपा की रणनीति साफ हैकृपहले संगठन को एकजुट करना, फिर सरकार की उपलब्धियों को गांव-गांव तक पहुंचाना और अंत में चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना। पार्टी को लगता है कि यदि नाराज नेताओं को समय रहते मना लिया गया तो 2027 की राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। लेकिन यदि असंतोष खुलकर सामने आया तो विपक्ष को भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिल सकता है। कुल मिलाकर उत्तराखंड भाजपा में इन दिनों चुनावी तैयारी के साथ-साथ मनाओ और साथ लाओ अभियान भी चल रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अपने रूठे नेताओं को कितनी सफलता से मना पाती है और इसका असर 2027 के चुनावी समीकरणों पर कितना पड़ता है।

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