प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नेता विपक्ष राहुल गांधी तक देश में इमरजेंसी की जो बात सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं क्या वह सब कुछ हवा हवाई बातें हैं और राजनीतिक शगूफेबाजी है या फिर देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति वास्तव में इमरजेंसी जैसी हो चुकी है जिसे खाड़ी युद्ध तथा राष्ट्रवाद की आड़ लेकर छिपाये जाने की कोशिशे सत्ता में बैठे नेता कर रहे हैं। सवाल वास्तव में अत्यंत ही गंभीर है। देश के बिगड़ते आर्थिक और राजनीतिक हालात का प्रभाव जनता पर पड़ रहा है वह अब उसकी रोजी—रोटी तथा कपड़ा और मकान की आवश्यक आवश्यकताओं तक पहुंच चुका है जिसे लेकर हर आम आदमी के अंदर बेचैनी और आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इन बिगड़ते हालातो को लेकर अब तक सिर्फ विपक्ष सरकार पर सवाल उठाता रहा है लेकिन अब खुद मोदी इसकी घोषणा कर चुके हैं वहीं देश—विदेश के अर्थशास्त्रियों से लेकर सरकार में उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी सवाल उठा रहे हैं। तथा महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने सरकार के कपड़े फाड़ना शुरू कर दिए हैं। देश में बेरोजगारी की क्या स्थिति है? इस पर गौर करें तो 90 फीसदी युवा आबादी का बेरोजगार होना और नीट जैसी तमाम परीक्षाओं के पेपर लीक होने के साथ—साथ सीबीएसई जैसी परीक्षा में व्यापक धांधली ने इन युवाओं को ही नहीं हर आम आदमी को झकझोर कर रख दिया है। देश की शिक्षा व रोजगार व्यवस्था का इस तरह से ध्वस्त होना और उस पर युवाओं का गुस्सा स्वाभाविक है। इसके ऊपर से देश में आर्थिक ढांचे का भरभरा कर गिर जाना गंभीर चिंता का विषय है डॉलर के मुकाबले रुपए का अब मूल्यन तो सभी देख रहे हैं लेकिन अर्थव्यवस्था में होने वाली वह लीकेज इसके बारे में जानकारी खुद आरबीआई द्वारा दी गई है जिसमें बीते 5 सालों में 2 लाख करोड़ के फ्रॉड की बात सामने आई है इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जनता की कमाई का 100 करोड़ रूपया हर रोज ठगा गया है सरकार और हमारा सिस्टम उसे रोक पाने में पूरी तरह विफल रहा है। अभी हाल ही में सेवी ने राजेश एक्सपोर्ट के जिस 15 लाख करोड़ के वित्तीय घोटाले का खुलासा किया है। वह सिर्फ चौंकाने वाला ही नहीं है बल्कि 7 साल तक देश की जांच एजेंसियों को इसकी भनक तक न लग पाना सरकार और सिस्टम की नाकामी बताने के लिए काफी है। खास बात यह है कि इस महा घोटाले में एलआईसी जैसी वित्तीय संस्था का भी 11 फीसदी पैसा लगा है। देश में कोरोना काल से ही डूब चुके देश के एसएसएमई सेक्टर की बदहाली से भी देश आज तक नहीं उबर सका है। देश का एक्सपोर्ट घटता जा रहा है घरेलू उत्पाद भी घट रहा है आयात पर निर्भरता बढ़ रही है विदेशी निवेशक अपना धन निकालकर भाग रहे हैं। बेरोजगारी सीमा पार जा चुकी है। ऐसी स्थिति में जनता पर लगातार महंगाई का बढ़ता बोझ असहनीय होता जा रहा है तब स्वाभाविक तौर पर सरकार के खिलाफ आम आदमी की नाराजगी भी बढ़ रही है। देश के लोकतंत्र को सरकार ने कैप्चर कर लिया है वह सिर्फ चुनाव जीतने के हथकंडों तक ही सिमट चुकी है यहां तक कि न्यायपालिका तक जनहितों की रक्षा नहीं कर पा रही है जिसका उदाहरण वह 27 लाख पश्चिम बंगाल के वोटर हैं जिन्हें मत के अधिकार से वंचित किया गया और मतदान की तिथि तक उनके केस पर फैसला लेने के बजाय यह कह दिया गया कि एक बार वोट नहीं डालोगे तो क्या बिगड़ जाएगा? इसे अगर इमरजेंसी नहीं कहा जाए तो क्या कहेंगे। सरकार भले ही कुछ भी दावे करें लेकिन देश में जिस तरह के राजनीतिक और आर्थिक हालात हैं वह अघोषित इमरजेंसी से भी खतरनाक है।




